भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १.११ ·

English

मूल श्लोक

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

ayaneṣu ca sarveṣu yathābhāgamavasthitāḥ bhīṣmamevābhirakṣantu bhavantaḥ sarva eva hi

१.११अध्याय १ · अर्जुनविषादयोग४७ में से श्लोक ११

अनुवाद

(तो अब) नियुक्त के अनुसार सब अयनों में अर्थात् सेना के भिन्न-भिन्न प्रवेश-द्वारों में रहकर तुम सब को मिल करके भीष्म की ही सभी ओर से रक्षा करनी चाहिए।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सेनापति भीष्म स्वयं पराक्रमी और किसी से भी हार जाने वाले न थे। 'सभी ओर से सब को उनकी रक्षा करनी चाहिए,' इस कथन का कारण दुर्योधन ने दूसरे स्थल पर (मभा॰ भी.15.15 – 20; 99.40 – 41) यह बत-लाया है, कि भीष्म का निश्चय था कि हम शिखण्डी पर शस्त्र न चलावेंगे, इस लिए शिखण्डी की ओर से भीष्म के घात की सम्भावना था। अतएव सब को सावधानी रखनी चाहिए – अरक्ष्यमाणं हि वृको हन्यात् सिहं महाबलम्। मा सिहं जम्बुकेनेव घातयेथाः शिखण्डि ना॥ “महाबलवान सिंह की रक्षा न करें तो भेड़िया उसे मार डालेगा; इसलिए जम्बुक सदृश शिखण्डी से सिंह का घात न होने दो।” शिखण्डी को छोड़कर और दूसरे किसी की भी खबर लेने के लिए भीष्म अकेले ही समर्थ थे, किसी की सहायता की उन्हें अपेक्षा न थी।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १, श्लोक १.११