भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १.१० ·

English

मूल श्लोक

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

aparyāptaṃ tadasmākaṃ balaṃ bhīṣmābhirakṣitam paryāptaṃ tvidameteṣāṃ balaṃ bhīmābhirakṣitam

१.१०अध्याय १ · अर्जुनविषादयोग४७ में से श्लोक १०

अनुवाद

इस प्रकार हमारी यह सेना, जिसकी रक्षा स्वयं भीष्म कर रहे है, अपर्याप्त अर्थात् अपरिमित या अमर्यादित है; किन्तु उन (पांडवों) की वह सेना जिसकी रक्षा भीम कर रहा है, पर्याप्त अर्थात् परिमित या मर्यादित है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक में 'पर्याप्त' और 'अपर्याप्त' शब्दों के अर्थ के विषय में मतभेद है। 'पर्याप्त' का सामान्य अर्थ 'बस' या 'काफी' होता है, इसलिए कुछ लोग यह अर्थ बतलाते है कि 'पाण्डवों की सेना काफी है और हमारी काफी नहीं है,' परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है। पहले उद्योगपर्व में धृतराष्ट्र से अपनी सेना का वर्णन करते समय उस उक्त मुख्य-मुख्य सेनापतियों के नाम बतला कर, दुर्योधन ने कहा है कि 'मेरी सेना बड़ी और गुणवान है, इसलिए जीत मेरी ही होगी।' (उ॰ 53.60 – 70)। इसी प्रकार आगे चलकर भीष्मपर्व में, जिस समय द्रोणाचार्य के पास दुर्योधन फिर से सेना का वर्णन कर रहा था, उस समय भी गीता के उपर्युक्त श्लोकों के समान ही श्लोक उसने अपने मुँह से ज्यों के त्यों कहे है (भीष्म॰ 51.4 – 6)। और, तीसरी बात यह कि सब सैनिकों को प्रोत्साहित करने के लिए ही हर्षपूर्वक यह वर्णन किया गया है। इन सब बातों का विचार करने से, इस स्थान पर, 'अपर्याप्त' शब्द का अर्थ 'अमर्यादित,' 'अपार' या 'अगणित' के सिवा और कोई अर्थ हो ही नहीं सकता। 'पर्याप्त' शब्द का धात्वर्थ चहुँ ओर (परि-) वेष्टन करने योग्य (आप् = प्रापणे) है। परन्तु, अमुक काम के लिए पर्याप्त या अमुक मनुष्य के लिए पर्याप्त, इस प्रकार पर्याप्त शब्द के पीछे चतुर्थी अर्थ के दूसरे शब्द जोड़कर प्रयोग करने से पर्याप्त शब्द का यह अर्थ हो जाता है – उस काम के लिए या मनुष्य के लिए भरपूर अथवा समर्थ। और यदि 'पर्याप्त' के पीछे कोई दूसरा शब्द न रखा जावें, तो केवल 'पर्याप्त' शब्द का अर्थ होता है, भरपूर, परिमित या जिसकी गिनती की जा सकती है। प्रस्तुत श्लोक में पर्याप्त शब्द के पीछे दूसरा कोई शब्द नहीं है, इसलिए यहाँ पर उसका उपर्युक्त दूसरा अर्थ (परिमित या मर्यादित) विवक्षित है; और महाभारत के अतिरिक्त अन्यत्र भी ऐसे प्रयोग किए जाने के उदाहरण ब्रह्मानन्दगिरि कृत टीका में दिए गए है। कुछ लोगों ने यह उपपत्ति बतलाई है, कि दुर्योधन भय से अपनी सेना को 'अपर्याप्त' या 'बस नहीं' कहता है, परन्तु यह ठीक नहीं है; क्योंकि दुर्योधन के डर जाने का वर्णन कहीं भी नहीं मिलता; किन्तु इसके विपरीत यह वर्णन पाया जाता है कि दुर्योधन की बड़ी भारी सेना देखकर पाण्डवों ने वज्र नामक व्यूह रचा और कौरवों की अपार सेना को देखकर युधिष्ठिर को बहुत खेद हुआ था (मभा॰ भीष्म॰ 19.5 और 21.1)। पांडवों की सेना का सेनापति धृष्टद्युम्न था, परन्तु 'भीम रक्षा कर रहा है' कहने का कारण यह है कि इस व्यूह के अग्र भाग में भीम ही नियुक्त किया गया था, अतएव सेनारक्षक की दृष्टि से दुर्योधन को वही सामने दिखाई दे रहा था। (मभा॰ भीष्म॰ 19.4 – 11,33,34); और इसी अर्थ में इन दोनों सेनाओं के विषय में, महाभारत से गीता के पहले के अध्यायों में 'भीमनेत्र' और 'भीष्मनेत्र' कहा गया है (देखो महा॰ भी॰ 20.1)।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १, श्लोक १.१०