जब मन हो
अकेलापन
५ श्लोक
- श्लोक ६.२९सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥(इस प्रकार) जिसका आत्मा योगयुक्त हो गया है, उसकी दृष्टि सम हो जाती है; उसे सर्वत्र ऐसा दीख पड़ने लगता है, कि मैं सब प्राणियों में हूँ और सब प्राणी मुझ में है।
- श्लोक ६.३०यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥जो मुझको (परमेश्वर परमात्मा) सब स्थानों में और सब को मुझमें देखता है, उससे मैं कभी नहीं बिछुड़ता, और न वह ही मुझसे कभी दूर होता है।
- श्लोक ९.२९समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥मैं सब को एक सा हूँ। न मुझे (कोई) द्वेष्य अर्थात् अप्रिय है और न (कोई) प्यारा। भक्ति से जो मेरा भजन करते है, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।
- श्लोक १०.२०अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥हे गुडाकेश! सब भूतों के भीतर रहनेवाला आत्मा मैं हूँ, और सब भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ।
- श्लोक १८.६१ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥हे अर्जुन! ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में रह कर (अपनी) माया से प्राणिमात्र को (ऐसे) घुमा रहा है मानो सभी (किसी) यन्त्र पर चढ़ाए गए हों।