शिक्षाएँ
संयमित जीवन
३ श्लोक
- श्लोक ६.१६नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥हे अर्जुन! अतिशय खानेवाले या बिलकुल न खानेवाले और खूब सोने वाले या जागरण करनेवाले को (यह) योग सिद्ध नहीं होता।
- श्लोक ६.१७युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥जिसका आहार विहार नियमित है, कर्मों का आचरण नपा-तुला है और सोना जागना परिमित है, उसको (यह) योग दुःख-घातक अर्थात् सुखावह होता है।
- श्लोक १७.१५अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥(मन को) उद्वेग न करनेवाले सत्य, प्रिय और हितकारक सम्भाषण को तथा स्वाध्याय अर्थात् अपने कर्म के अभ्यास को वाङ्मय (वाचिक) तप कहते हैं।