भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.१७ ·

English

मूल श्लोक

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā

६.१७अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक १७

अनुवाद

जिसका आहार विहार नियमित है, कर्मों का आचरण नपा-तुला है और सोना जागना परिमित है, उसको (यह) योग दुःख-घातक अर्थात् सुखावह होता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक में 'योग' से पातंजल-योग की क्रिया और 'युक्त' से नियमित नपी-तुली अथवा परिमित का अर्थ है। आगे भी दो-एक स्थानों पर योग से पातंजल-योग का ही अर्थ है। तथापि इतने ही से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि इस अध्याय में पातंजल-योग ही स्वतन्त्र रीति से प्रतिपाद्य है। पहले स्पष्ट बतला दिया है, कि कर्मयोग को सिद्ध कर लेना जीवन का प्रधान कर्तव्य है और उसके साधन मात्र के लिए पातंजल-योग का यह वर्णन है। इस श्लोक के 'कर्म के उचित आचरण' इन शब्दों से भी प्रगट होता है, कि अन्यान्य कर्मों को कहते हुए इस योग का अभ्यास करना चाहिए। अब योगी का थोड़ा-सा वर्णन करके समाधि-सुध का स्वरूप बतलाते है–

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.१७