जब मन हो
क्रोध में
६ श्लोक
- श्लोक २.५६दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥दुःख में जिसके मन को खेद नहीं होता, सुख में जिसकी आसक्ति नहीं और प्रीति, भय एवं क्रोध जिसके छूट गए हैं, उसको स्थितप्रज्ञ मुनि कहते है।
- श्लोक २.६२ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥विषयों का चिन्तन करनेवाले पुरुष का इन विषयों में संग बढ़ता जाता है। फिर इस संग से वासना उत्पन्न होती है, कि हमको काम (अर्थात् यह विषय) चाहिए। और (इस काम की तृप्ति होने में विघ्न होने से) उस काम से ही क्रोध की उत्पत्ति होती है;
- श्लोक २.६३क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥क्रोध से सम्मोह अर्थात् अविवेक होता है, सम्मोह से स्मृतिभ्रम, स्मृतिभ्रम से बुद्धिनाश और बुद्धिनाश से (पुरुष का) सर्वस्व नाश हो जाता है।
- श्लोक ३.३७श्रीभगवानुवाच । काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥श्रीभगवान ने कहा: इस विषय में यह समझो कि रजोगुण से उत्पन्न होनेवाला बड़ा पेटू और बड़ा पापी यह काम एव यह क्रोध ही शत्रु है।
- श्लोक १६.२अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥अहिंसा, सत्य, अक्रोध, कर्मफल का त्याग, शान्ति , अपैशुन्य अर्थात् क्षुद्र-दृष्टि छोड़कर उदार भाव रखना, सब भूतों में दया, तृष्णा न रखना, मृदुता, (बुरे काम की) लाज, अचपलता अर्थात् फिजूल कामों का छूट जाता,
- श्लोक १६.२१त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥काम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं। ये हमारा नाश कर डालते हैं; इसलिए इन तीनों का त्याग करना चाहिए।