मूल श्लोक
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
mayā'dhyakṣeṇa prakṛtiḥ sūyate sacarācaram hetunā'nena kaunteya jagadviparivartate
अनुवाद
मैं अध्यक्ष होकर प्रकृति से सब चराचर सृष्टि उत्पन्न करवाता हूँ। हे कौन्तेय! इस कारण जगत का यह बनना-बिगड़ना हुआ करता है।
टिप्पणी
पिछले अध्याय में बतला आए है, कि ब्रह्मदेव के दिन का (कल्प का) आरम्भ होते ही अव्यक्त प्रकृति से व्यक्त सृष्टि बनने लगती है (8.18)। यहाँ इसी का अधिक खुलासा किया है, कि परमेश्वर प्रत्येक के कर्मानुसार उसे भला-बुरा जन्म देता है, अतएव वह स्वयं इन कर्मों से अलिप्त है। शास्त्रीय प्रतिपादन में ये सभी तत्त्व एक ही स्थान में बतला दिए जाते है। परन्तु गीता की पद्धति संवादात्मक है, इस कारण प्रसंग के अनुसार एक विषय थोड़ा-सा यहाँ और थोड़ा-सा वहाँ इस प्रकार वर्णित है। कुछ लोगों की दलील है, कि दसवें श्लोक में 'जगद्विपरिवर्ते' पद विवर्त-वाद को सूचित करते है। परन्तु 'जगत का बनना-बिगड़ना हुआ करता है,' अर्थात् 'व्यक्त का अव्यक्त और फिर अव्यक्त का व्यक्त होता रहता है' हम नहीं समझते इसकी अपेक्षा 'विपरिवर्ते' पद का कुछ अधिक अर्थ हो सकता है। और शांकरभाष्य में भी और कोई विशेष अर्थ नहीं बतलाया गया है। गीता रहस्य के दसवें प्रकरण में विवेचन किया गया है, कि मनुष्य कर्म से अवश कैसे होता है।
— Lokmanya Tilak