मूल श्लोक
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
adhibhūtaṃ kṣaro bhāvaḥ puruṣaścādhidaivatam adhiyajño'hamevātra dehe dehabhṛtāṃ vara
अनुवाद
(उपजे हुए सब प्राणियों की) चर अर्थात् नामरूपात्मक नाशवान स्थिति अधिभूत है; और (इस पदार्थ में) जो पुरुष अर्थात् सचेतन अधिष्ठाता है, वही अधिदैवत है; (जिसे) अधियज्ञ (सब यज्ञों का अधिपति कहते है, वह) मैं ही हूँ। हे देहधारियों में श्रेष्ठ! मैं इस देह में (अधिदेह) हूँ।
टिप्पणी
तीसरे श्लोक का 'परम' शब्द ब्रह्म का विशेषण नहीं है किन्तु अक्षर का विशेषण है। सांख्यशास्त्र में अव्यक्त प्रकृति को भी 'अक्षर' कहा है (गी॰ 15.16)। परन्तु वेदान्तियों का ब्रह्म इस अव्यक्त और अक्षर प्रकृति के भी परे का है (इसी अध्याय का 20 वाँ और 31 वाँ श्लोक देखो) और इसी कारण अकेले 'अक्षर' शब्द के प्रयोग से सांख्यों की प्रकृति अथवा ब्रह्म दोनों अर्थ हो सकते है। इसी सन्देह को मिटाने के लिए 'अक्षर' शब्द के आगे 'परम' विशेषण रखकर ब्रह्म की व्याख्या की है (देखो गीतार॰ पृ. 201 – 202)। हमने 'स्वभाव' शब्द का अर्थ महाभारत में दिए हुए उदाहरणों के अनुसार किसी भी पदार्थ का 'सूक्ष्मस्वरूप' किया है। नासदीय सूक्त में दृश्य जगत को परब्रह्म की विसृष्टि (विसर्ग) कहा है (गीतार॰ पृ. 254); और विसर्ग शब्द का वही अर्थ यहाँ लेना चाहिए। विसर्ग का अर्थ 'यज्ञ का हविरुत्सर्ग' करने की कोई जरूरत नहीं है। गीतारहस्य के दसवें प्रकरण (पृ. 262) में विस्तृत विवेचन किया गया है, कि इस दृश्य सृष्टि को ही कर्म क्यों कहते है। पदार्थमात्र के नाम-रूपात्मक विनाशी स्वरूप को 'क्षर' कहते है और इससे परे जो अक्षर तत्त्व है उसी को ब्रह्म समझना चाहिए। 'पुरुष' शब्द से सूर्य का पुरुष, जल का देवता या वरुणपुरुष इत्यादि सचेतन सूक्ष्म देहधारी देवता विवक्षित है और हिरण्यगर्भ का भी उसमें समावेश होता है। यहाँ भगवान ने 'अधियज्ञ' शब्द की व्याख्या नहीं की। क्योंकि यज्ञ के विषय में तीसरे और चौथे अध्यायों में विस्तारसहित वर्णन हो चुका है और फिर आगे भी कहा है, कि 'सब यज्ञों का प्रभु और भोक्ता मैं ही हूँ' (देखो गी॰ 9.24; 5.29 और मभा॰ शां॰ 340)। इस प्रकार अध्यात्म आदि के लक्षण बतला कर अन्त में संक्षेप में कह दिया है, कि इस देह में 'अधियज्ञ' मैं ही हूँ अर्थात् मनुष्य-देह मे अधिदेव और अधियज्ञ भी मैं ही हूँ। प्रत्येक देह में पृथक-पृथक आत्मा (पुरुष) मान कर सांख्यवादी कहते है, कि वे असंख्य हैं। परन्तु वेदान्तशास्त्र को यह मत मान्य नहीं हैं; उसने निश्चय किया है, कि यद्यपि देह अनेक हैं तथापि आत्मा सब में एक ही है (गीतार॰ पृ. 165 – 166)। 'अधिदेह मैं ही हूँ' इस वाक्य में यही सिद्धान्त दर्शाया है; तो भी इस वाक्य के 'मैं ही हूँ' शब्द केवल अधियज्ञ अथवा अधिदेह को ही उद्देश्य करके प्रयुक्त नहीं हैं, उनका सम्बन्ध अध्यात्म आदि पूर्वपदों से भी है। अतः समग्र अर्थ ऐसा नहीं होता है, कि अनेक प्रकार के यज्ञ, अनेक पदार्थों के अनेक देवता, विनाशवान पंचमहाभूत, पदार्थमात्र के सूक्ष्म भाग अथवा विभिन्न आत्मा, ब्रह्म, कर्म अथवा भिन्न-भिन्न मनुष्यों की देह – इस सब में 'मैं ही हूँ,' अर्थात् सब में एक ही परमेश्वरतत्त्व है। कुछ लोगों का कथन है, कि यहाँ 'अधिदेह' स्वरूप का स्वतन्त्र वर्णन नहीं है, अधियज्ञ की व्याख्या करने में अधिदेह का पर्याय से उल्लेख हो गया है; किन्तु हमें यह अर्थ ठीक नहीं जान पड़ता। क्योंकि न केवल गीता में ही, प्रत्युत उपनिषदों और वेदान्तसूत्रों में भी (बृ॰ 3.7; वे॰ सू॰ 1.2.20) जहाँ यह विषय आया है, वहाँ अधिभूत आदि स्वरूपों के साथ ही साथ शरीर आत्मा का भी विचार किया है और सिद्धान्त किया है, कि सर्वत्र एक ही परमात्मा है। ऐसे ही गीता में जब कि अधिदेह के विषय में पहले ही प्रश्न हो चुका है, तब यहाँ उसी के पृथक उल्लेख को विवक्षित मानना युक्तिसंगत है। यदि यह सच है, कि सब कुछ परब्रह्म ही है, तो पहले-पहल ऐसा बोध होना सम्भव है, कि उसके अधिभूत आदि स्वरूपों का वर्णन करते समय उसमें परब्रह्म को भी शामिल कर लेने की कोई जरूरत न थी। परन्तु नानात्व-दर्शक यह वर्णन उन लोगों को लक्ष्य करके किया गया है कि जो ब्रह्म, आत्मा, देवता और यज्ञनारायण आदि अनेक भेद करके नाना प्रकार की उपासनाओं में उलझे रहते हैं; अतएव पहले वे लक्षण बतलाए गए है, कि जो उन लोगों की समझ के अनुसार होते हैं, और फिर सिद्धान्त किया है कि 'यह सब मैं ही हूँ।' उक्त बात पर ध्यान देने से कोई भी शंका नहीं रह जाती। अस्तु, इस भेद का तत्त्व बतला दिया गया कि उपासना के लिए अधिभूत, अधिदैवत, अध्यात्म, अधियज्ञ और अधिदेह प्रभृति अनेक भेद करने पर भी यह नानात्व सच्चा नहीं हैं; वास्तव में एक ही परमेश्वर सब में व्याप्त है। अब अर्जुन के इस प्रश्न का उत्तर देते है, कि अन्तकाल में सर्व्यापी भगवान कैसे पहचाना जाता है –
— Lokmanya Tilak