भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ८.२२ ·

English

मूल श्लोक

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyastvananyayā yasyāntaḥsthāni bhūtāni yena sarvamidaṃ tatam

८.२२अध्याय ८ · अक्षरब्रह्मयोग२८ में से श्लोक २२

अनुवाद

हे पार्थ! जिसके भीतर (सब) भूत है और जिसने इस सब को फैलाया अथवा व्याप्त कर रखा है, वह पर अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

बीसवाँ और इक्कीसवाँ श्लोक मिलकर एक वाक्य बना है। 20 वें श्लोक का 'अव्यक्त' शब्द पहले सांख्यों की प्रकृति को, अर्थात् 18 वें श्लोक के अव्यक्त द्रव्य को लक्ष्य करके प्रयुक्त है और आगे वही शब्द सांख्यों की प्रकृति से परे परब्रह्म के लिए भी उपयुक्त हुआ है; तथा 21 वें श्लोक में कहा है, कि इसी दूसरे अव्यक्त को 'अक्षर' भी कहते है। अध्याय के आरम्भ में भी 'अक्षरं ब्रह्म परमं' यह वर्णन है। सारांश, 'अव्यक्त' शब्द के समान ही गीता में 'अक्षर' शब्द का भी दो प्रकार से उपयोग किया गया है। कुछ यह नहीं, कि सांख्यों की प्रकृति ही अव्यक्त और अक्षर है, किन्तु परमेश्वर या ब्रह्म भी, कि जो 'सब भूतों का नाश हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता,' अव्यक्त और अक्षर है। पन्द्रहवें अध्याय में पुरुषोत्तम के लक्षण बतलाते हुए जो यह वर्णन है, कि वह क्षर और अक्षर से परे का है, उससे प्रगट है कि वहाँ का 'अक्षर' शब्द सांख्यों की प्रकृति के लिए उद्दिष्ट है (देखो गी॰ 15.16 – 18)। ध्यान रहे, कि 'अव्यक्त' और 'अक्षर' दोनों विशेषणों का प्रयोग गीता में कभी सांख्यों की प्रकृति के लिए, और कभी प्रकृति से परे परब्रह्म के लिए किया गया है (देखो गीतार॰ पृ. 201 और 202)। व्यक्त और अव्यक्त से परे जो परब्रह्म है, उसका स्वरूप गीतारहस्य के नववें प्रकरण में स्पष्ट कर दिया गया है। उस 'अक्षरब्रह्म' का वर्णन हो चुका, कि जिस स्थान में पहुँच जाने से मनुष्य पुनर्जन्म की सपेट से छूट जाता है। अब मरने पर जिन्हें लौटना नहीं पड़ता (अनावृत्ति) और जिन्हें स्वर्ग से लौट कर जन्म लेना पड़ता है (आवृत्ति) उनके बीज के समय का और गति का भेद बतलाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ८, श्लोक ८.२२