मूल श्लोक
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
adhiyajñaḥ kathaṃ ko'tra dehe'sminmadhusūdana prayāṇakāle ca kathaṃ jñeyo'si niyatātmabhiḥ
अनुवाद
अधियज्ञ कैसा होता है? हे मधुसूदन! इस देह में (अधिदेह) कौन है? और अन्तकाल में इन्द्रियनिग्रह करनेवाले लोग तुमको कैसे पहचानते हैं?
टिप्पणी
ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत और अधियज्ञ शब्द पिछले अध्याय में आ चुके है; इनके सिवा अब अर्जुन ने यह नया प्रश्न किया है, कि अधिदेह कौन है? इस पर ध्यान देने से आगे के उत्तर का अर्थ समझने में कोई अड़चन न होगी।
— Lokmanya Tilak