भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ७.२३ ·

English

मूल श्लोक

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

antavattu phalaṃ teṣāṃ tadbhavatyalpamedhasām devāndevayajo yānti madbhaktā yānti māmapi

७.२३अध्याय ७ · ज्ञानयोग३० में से श्लोक २३

अनुवाद

परन्तु (इन) अल्पबुद्धि लोगों को मिलने वाले ये फल नाशवान है (मोक्ष के समान स्थिर रहनेवाले नहीं हैं)। देवताओं को भजने वाले उनके पास जाते हैं और मेरे भक्त मेरे यहाँ आते हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

साधारण मनुष्यों की समझ होती है, यद्यपि परमेश्वर मोक्षदाता है, तथापि संसार के लिए आवश्यक अनेक इच्छित वस्तुओं को देने की शक्ति देवताओं में ही है और उन की प्राप्ति के लिए इन्हीं देवताओं की उपासना करनी चाहिए। इस प्रकार जब यह समझ दृढ़ हो गई, कि देवताओं की उपासना करनी चाहिए, तब अपनी-अपनी स्वाभाविक श्रद्धा के अनुसार (देखा गी॰ 17.1 – 6) कोई पीपल पूजते है, कोई किसी चबूतरे की पूजा करते हैं और कोई किसी बड़ी भारी शिला को सिंदूर से रँग कर पूजते है। इसी बात का वर्णन उक्त श्लोकों में सुन्दर रीति से किया गया है। इसमें ध्यान देने योग्य पहली बात यह है कि भिन्न-भिन्न देवताओं की आराधना से जो फल मिलता है, उसे आराधक समझते है कि उसके देनेवाले वे ही देवता हैं, परन्तु पर्याय से वह परमेश्वर की पूजा हो जाती है (गी॰ 9.23) और तात्त्विक दृष्टि से यह फल भी परमेश्वर ही दिया करते है (श्लोक॰ 22)। यही नहीं, इस देवता का आराधन करने को बुद्धि भी मनुष्य के पूर्वकर्मानुसार परमेश्वर ही देता है (श्लोक 21)। क्योंकि इस जगत में परमेश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वेदान्तसूत्र (3.2.38 – 41) और उपनिषद (कौषी॰ 3.8) में भी यही सिद्धान्त है। इन भिन्न-भिन्न देवताओं की भक्ति करते-करते बुद्धि स्थिर और शुद्ध हो जाती है, तथा अन्त में एक एवं नित्य परमेश्वर का ज्ञान होता है – यही इन भिन्न-भिन्न उपासनाओं का उपयोग है। परन्तु इससे पहले जो फल मिलते हैं, वे सभी अनित्य होते हैं। अतः भगवान का उपदेश है, कि इन फलों की आशा में न उलझकर 'ज्ञानी' भक्त होने की उमंग प्रत्येक मनुष्य को रखनी चाहिए। माना, कि भगवान सब बातों के करनेवाले और फलों के दाता हैं, पर वे जिसके जैसे कर्म होंगे तदनुसार ही तो फल देंगे (गी॰ 4.11); अतः तात्विक दृष्टि से यह भी कहा जाता है, कि वे स्वयं कुछ भी नहीं करते (गी॰ 5.14)। गीतारहस्य के 10 वें प्रकरण (पृ. 236) और 13 वें प्रकरण (पृ.426 – 427) में इस विषय का अधिक विवेचन है, उसे देखो। कुछ लोग यह भूल जाते है कि देवताराधन का फल भी ईश्वर ही देता है और वे प्रकृतिस्वभाव के अनुसार देवताओं की धुन में लग जाते हैं। अब ऊपर के इसी वर्णन का स्पष्टीकरण करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ७, श्लोक ७.२३