मूल श्लोक
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
bahūnāṃ janmanāmante jñānavānmāṃ prapadyate vāsudevaḥ sarvamiti sa mahātmā sudurlabhaḥ
अनुवाद
अनेक जन्मों के अनन्तर यह अनुभव हो जाने से कि 'जो कुछ है, वह सब वासुदेव ही है,' ज्ञानवान् मुझे पा लेता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
टिप्पणी
क्षर-अक्षर की दृष्टि से भगवान ने अपने स्वरूप का यह ज्ञान बतला दिया, कि प्रकृति और पुरुष दोनों मेरे ही स्वरूप हैं और चारों ओर मैं ही एकता से भरा हूँ; इसके साथ ही भगवान ने ऊपर जो यह बतलाया है, कि इस स्वरूप की भक्ति करने से परमेश्वर की पहचान हो जाती है, इसके तात्पर्य को भली-भाँति स्मरण रखना चाहिए। उपासना सभी को चाहिए, फिर चाहे व्यक्त की करो चाहे अव्यक्त की; परन्तु व्यक्त की उपासना सुलभ होने के कारण यहाँ उसी का वर्णन है और उसी का नाम भक्ति है। तथापि स्वार्थ-बुद्धि को मन में रख कर किसी विशेष हेतु से भक्ति करनेवाले (जिज्ञासु) को भी सच्चा ही समझना चाहिए; क्योंकि उसकी जिज्ञासुत्व-अवस्था से ही व्यक्त होता है, कि अभी तक उसको परिपूर्ण ज्ञान नहीं हुआ। तथापि कहा है, कि ये सब भक्ति करनेवाले होने के कारण उदार अर्थात् अच्छे मार्ग से (जाने वाले है) (श्लोक 18)। पहले तीन श्लोकों का तात्पर्य है कि ज्ञान-प्राप्ति से कृतार्थ हो करके जिन्हें इस जगत में कुछ करने अथवा पाने के लिए नहीं रह जाता (गी॰ 3.17 – 19), ऐसे ज्ञानी पुरुष निष्कामबुद्धि से जो भक्ति करते है (भाग॰ 1.6. 10) वही सब से श्रेष्ठ है। प्रह्लाद-नारद आदि के भक्ति इसी श्रेष्ठ श्रेणी की है, और इसी से भगवान में भक्ति का लक्षण 'भक्तियोग अर्थात् परमेश्वर की निर्हेतुक और निरन्तर भक्ति ' माना है (भाग॰ 3.26.12; और गीतार॰ पृ.409 – 410)। 14 वें और 16 वें श्लोक के 'एकभक्तिः' और 'वासुदेवः' पद भागवत धर्म का ही है। क्योंकि महाभारत (शां॰ 341.33 – 35) में इस धर्म के वर्णन में चतुर्विध भक्तों का उल्लेख करते हुए कहा है कि – चतुर्विधा मम जना भक्ता एवं हि में श्रुतम्। तेषामेकान्ति नः श्रेष्ठा ये चैवानन्यदेवताः॥ अहमेव गतिस्तेषां निराशीः कर्मकारिणाम्। ये च शिष्टास्त्रयो भक्ताः फलकामा हि ते मताः॥ सर्वे च्यवनधर्मास्ते प्रतिबुद्धस्तु श्रेष्ठाभाक्। अनन्यदैवत और एकान्तिक भक्त जिस प्रकार निराशीः अर्थात् फलाशारहित कर्म करता है उस प्रकार अन्य तीन भक्त नहीं करते, वे कुछ न कुछ हेतु मन में रख कर भक्ति करते है, इसी से वे तीनों च्यवनशील हैं और एकान्ती प्रतिबुद्ध (जानकार) है। एवं आगे 'वासुदेव' शब्द की आध्यात्मिक व्युत्पत्तियों की है - 'सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम्' – मैं प्राणिमात्र में वास करता हूँ, इसी से मुझको वासुदेव कहते है (शां॰ 314.40)। अब यह वर्णन करते है कि यदि सर्वत्र एक ही परमेश्वर है तो लोग भिन्न-भिन्न देवताओं की उपासना क्यों करते है, और ऐसे उपासकों को क्या फल मिलता है–
— Lokmanya Tilak