भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.१९ ·

English

मूल श्लोक

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yathā dīpo nivātastho neṅgate sopamā smṛtā yogino yatacittasya yuñjato yogamātmanaḥ

६.१९अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक १९

अनुवाद

वायुरहित स्थान में रखे हुए दीपक की ज्योति जैसी निश्चल होती है, वही उपमा चित्त को संयत करके योगाभ्यास करनेवाले योगी को दी जाती है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस उपमा के अतिरिक्त महाभारत (शान्ति 300.32. 34) में ये दृष्टान्त है – 'तेल से भरे हुए पात्र को जीने पर से ले जाने में, या तूफान के समय नाव का बचाव करने में, मनुष्य जैसा 'युक्त' अथवा एकाग्र होता है, योगी का मन वैसा ही एकाग्र रहता है।' कठोपनिषद् का सारथी और रथ के घोड़ों वाला दृष्टान्त तो प्रसिद्ध ही है; यद्यपि यह दृष्टान्त गीता में स्पष्ट आया नहीं है, तथापि दूसरे अध्याय के 67 और 68 तथा इसी अध्याय का 25 वाँ श्लोक, ये उस दृष्टान्त को मन में रख कर कहे गए हैं। यद्यपि योग का गीता का पारिभाषिक अर्थ कर्मयोग है, तथापि उस शब्द के अन्य अर्थ भी गीता में आए है। उदाहरणार्थ, 9.5 और 10.7 श्लोक में योग का अर्थ है, 'अलौकि क अथवा चाहे जो करने का शक्ति ।' यह भी कह सकते है, कि योग शब्द के अनेक अर्थ होने के कारण ही गीता में पातंजल-योग और सांख्य मार्ग के प्रतिपाद्य बतलाने की सुविधा उन-उन सम्प्रदायवालों को मिल गई। 19 वें श्लोक में वर्णित चित्त-निरोधरूपी पातंजल-योग की समाधि का स्वरूप ही अब विस्तार से कहते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.१९