भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ५.९ ·

English

मूल श्लोक

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

pralapanvisṛjangṛhṇannunmiṣannimiṣannapi indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan

५.९अध्याय ५ · संन्यासयोग२९ में से श्लोक ९

अनुवाद

बोलने में, विसर्जन करने में, लेने में, आँखों के पलक खोलने और बन्द करने में भी, ऐसी बुद्धि रखकर व्यवहार करें कि (केवल) इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में बर्ती हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

अन्त के दो श्लोक मिलकर एक वाक्य बना है, और उसमें बतलाए हुए सब कर्म भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के व्यापार हैं; उदाहरणार्थ, विसर्जन करना गुद का, लेना हाथ का, पलक गिराना प्राणवायु का, देखना आँखों का इत्यादि। 'मैं कुछ भी नहीं करता' इसका मतलब नहीं, कि इन्द्रियों को चाहे जो करने दे; किन्तु मतलब यह है कि 'मैं' इस अहंकार-बुद्धि के छूट जाने से अचेतन मन आप ही आप कोई बुरा काम नहीं कर सकती – और वे आत्मा के काबू में रहती है। सारांश, कोई पुरुष ज्ञानी हो जाएँ, तो भी श्वासोच्छ्वास आदि इन्द्रियों के कर्म उनकी इन्द्रियाँ करती ही रहेगी। और तो क्या, पल भर जीवित रहना भी कर्म ही है। फिर यह भेद कहाँ यह गया, कि संन्यासमार्ग का ज्ञानी पुरुष कर्म छोड़ता है और कर्मयोगी करता है? कर्म तो दोनों को करना ही पड़ता है। पर अहंकार-युक्त आसक्ति छूट जाने से वे ही कर्म बन्धक नहीं होते, इस कारण आसक्ति का छोड़ना ही इसका मुख्य तत्त्व है; और उसी का अब अधिक निरूपण करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ५, श्लोक ५.९