भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ५.२३ ·

English

मूल श्लोक

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक् शरीरविमोक्षणात् ।कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṃ prāk śarīravimokṣaṇāt kāmakrodhodbhavaṃ vegaṃ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ

५.२३अध्याय ५ · संन्यासयोग२९ में से श्लोक २३

अनुवाद

शरीर छूटने के पहले अर्थात् मरणपर्यन्त काम-क्रोध से होनेवाले वेग को इस लोक में ही सहन करने में (इन्द्रिय-संयम से) जो समर्थ होता है, वहीं युक्त और वही (सच्चा) सुखी है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

गीता के दूसरे अध्याय में भगवान ने कहा है कि तुझे सुख-दुःख सहना चाहिए (गी॰ 2.14) यह उसी का विस्तार और निरूपण है। गीता 2.14 में सुख-दुःखों को 'आगमापायिनः' विशेषण लगाया है, तो यहाँ 22 वें श्लोक में उनको 'आद्यन्तवन्तः' कहा है और 'मात्रा' शब्द के बदले 'बाह्य' शब्द का उपयोग किया है। इसी में 'युक्त' शब्द की व्याख्या भी आ गई है। सुख दुःखों का त्याग न कर समबुद्धि से उनको सहते रहना ही युक्तता का सच्चा लक्षण है। गीता॰ 2.61 पर टिप्पणी देखो।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ५, श्लोक ५.२३