मूल श्लोक
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
tadbuddhayastadātmānastanniṣṭhāstatparāyaṇāḥ gacchantyapunarāvṛttiṃ jñānanirdhūtakalmaṣāḥ
अनुवाद
और उस परमार्थ-तत्त्व में ही जिनकी बुद्धि रंग जाती है, वही जिनका अन्तःकरण रम जाता है और जो तन्निष्ट एवं तत्परायण हो जाते हैं, उनके पाप ज्ञान से बिलकुल धुल जाते है और वे फिर जन्म नहीं लेते।
टिप्पणी
इस प्रकार जिसका अज्ञान नष्ट हो जाएँ, उस कर्मयोगी की (संन्यासी की नहीं) ब्रह्मभूत या जीवन्मुक्त अवस्था का अब अधिक वर्णन करते हैं –
— Lokmanya Tilak