भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ५.११ ·

English

मूल श्लोक

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

kāyena manasā buddhyā kevalairindriyairapi yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṃ tyaktvā''tmaśuddhaye

५.११अध्याय ५ · संन्यासयोग२९ में से श्लोक ११

अनुवाद

(अतएव) कर्मयोगी (ऐसी अहंकार-बुद्धि न रखकर कि मैं करता हूँ, केवल) शरीर से, (केवल) मन से, (केवल) बुद्धि से और केवल इन्द्रियों से भी, आसक्ति छोड़ कर आत्मशुद्धि के लिए कर्म किया करते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

कायिक, वाचिक, मानसिक आदि कर्मों के भेदों को लक्ष्य कर इस श्लोक में शरीर, मन और बुद्धि शब्द आए हैं। मूल में यद्यपि 'केवलैः' विशेषण 'इन्द्रियैः' शब्द के पीछे है, तथापि वह शरीर, मन और बुद्धि को भी लागू है (गी॰ 4.21 देखो)। इसी से अनुवाद में उसे 'शरीर' शब्द के समान ही अन्य शब्दों के पीछे भी लगा दिया है। जैसे ऊपर के आठवें और नवें श्लोक में कहा है, वैसे ही यहाँ भी कहा है, कि अहंकार-बुद्धि एवं फलाशा के विषय में आसक्ति छोड़कर केवल कायिक, केवल वाचिक या केवल मानसिक कोई भी कर्म किया जाएँ, तो कर्ता को उसका दोष नहीं लगता (गीता॰ 3.27; 13.29 और 18.16 देखो)। अहंकार के न रहने से जो कर्म होते हैं, वे सिर्फ इन्द्रियों के है और मन आदिक सभी इन्द्रियाँ प्रकृति के ही विकार हैं, अतः ऐसे कर्मों का बन्धन कर्त्ता को नहीं लगता। अब इसी अर्थ को शास्त्रानुसार सिद्ध करते हैं –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ५, श्लोक ५.११