भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.३५ ·

English

मूल श्लोक

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yajjñātvā na punarmohamevaṃ yāsyasi pāṇḍava yena bhūtānyaśeṣeṇa drakṣyasyātmanyatho mayi

४.३५अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक ३५

अनुवाद

जिस ज्ञान को पाकर हे पांडव! फिर तुझे ऐसा मोह नहीं होगा और जिस ज्ञान के योग से समस्त प्राणियों को तू अपने में और मुझ में भी देखेगा।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सब प्राणियों को अपने में और अपने को सब प्राणियों में देखने का समस्त प्राणिमात्र में एकता को जो ज्ञान आगे वर्णित है (गी॰ 6.26), उसी का यहाँ उल्लेख किया गया है। मूल में आत्मा और भगवान दोनों एक-रूप है, अतएव आत्म में सब प्राणियों का समावेश होता है; अर्थात् भगवान में भी उनका समावेश होकर आत्मा (मैं), अन्य प्राणी और भगवान यह त्रिविध भेद नष्ट हो जाता है। इसी लिए भागवतपुराण में भगवद्भक्तों का लक्षण देते हुए कहा है, 'सब प्राणियों को भगवान में और अपने में जो देखता है, उसे उत्तम भागवत कहना चाहिए' (भाग॰ 11.2.45)। इस महत्त्व के नीतितत्त्व का अधिक खुलासा गीतारहस्य के बारहवें प्रकरण (पृ. 389 – 397) में और भक्ति -दृष्टि के तेरहवें प्रकरण (पृ. 429 – 430) में किया गया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.३५