मूल श्लोक
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yajjñātvā na punarmohamevaṃ yāsyasi pāṇḍava yena bhūtānyaśeṣeṇa drakṣyasyātmanyatho mayi
अनुवाद
जिस ज्ञान को पाकर हे पांडव! फिर तुझे ऐसा मोह नहीं होगा और जिस ज्ञान के योग से समस्त प्राणियों को तू अपने में और मुझ में भी देखेगा।
टिप्पणी
सब प्राणियों को अपने में और अपने को सब प्राणियों में देखने का समस्त प्राणिमात्र में एकता को जो ज्ञान आगे वर्णित है (गी॰ 6.26), उसी का यहाँ उल्लेख किया गया है। मूल में आत्मा और भगवान दोनों एक-रूप है, अतएव आत्म में सब प्राणियों का समावेश होता है; अर्थात् भगवान में भी उनका समावेश होकर आत्मा (मैं), अन्य प्राणी और भगवान यह त्रिविध भेद नष्ट हो जाता है। इसी लिए भागवतपुराण में भगवद्भक्तों का लक्षण देते हुए कहा है, 'सब प्राणियों को भगवान में और अपने में जो देखता है, उसे उत्तम भागवत कहना चाहिए' (भाग॰ 11.2.45)। इस महत्त्व के नीतितत्त्व का अधिक खुलासा गीतारहस्य के बारहवें प्रकरण (पृ. 389 – 397) में और भक्ति -दृष्टि के तेरहवें प्रकरण (पृ. 429 – 430) में किया गया है।
— Lokmanya Tilak