मूल श्लोक
स एवाऽयं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sa evā'yaṃ mayā te'dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ bhakto'si me sakhā ceti rahasyaṃ hyetaduttamam
अनुवाद
(सब रहस्यों में) उत्तम रहस्य समझकर इस पुरातन योग (कर्मयोगमार्ग) को, मैंने तुझे इसलिए बतला दिया, कि तू मेरा भक्त और सखा है।
टिप्पणी
गीतारहस्य के तीसरे प्रकरण (पृ. 55 – 64) में हमने सिद्ध किया है, कि इन तीनों श्लोकों में 'योग' शब्द से, आयु बिताने के उन दोनों मार्गों में से जिन्हें सांख्य और योग कहते हैं, योग अर्थात् कर्मयोग यानी साम्यबुद्धि से कर्म करने का मार्ग ही अभिप्रेत है। गीता के उस मार्ग की परम्परा ऊपर के श्लोक में बतलाई गई है, वह यद्यपि इस मार्ग की जड़ को समझने के लिए अत्यन्त महत्त्व की है, तथापि टीकाकारों ने उसकी विशेष चर्चा नहीं की है। महाभारत के अन्तर्गत नारायणीयोपाख्यान में भागवतधर्म का जो निरूपण है उसमें जनमेजय से वैशम्पायन कहते है कि यह धर्म पहले श्वेतद्वीप में भगवान से ही – नारदेन तु सम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रह.। एष धर्मो जगन्नाथात्साक्षान्नारायणान्नृप॥ एवमेष महान्धर्मः स ते पूर्व नृपोत्तम। कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पि तः॥ 'नारद को प्राप्त हुआ, हे राजा! वही महान धर्म तुझे पहले हरिगीता अर्थात् भगवद्गीता में समासविधि सहित बतलाया है' – (मभा॰ शां॰ 446.9 – 10)। और फिर कहा है कि 'युद्ध में विमनस्क हुए अर्जुन को यह धर्म बतलाया गया है' (मभा॰ शां॰ 348.8)। इससे प्रगट होता है कि गीता का योग अर्थात् कर्मयोग भागवतधर्म का है (गीतार॰ पृ. 8 – 10)। विस्तार हो जाने के भय से गीता में उसकी सम्प्रदाय-परम्परा सृष्टि की मूल आरम्भ से नहीं दी है; विवस्वान्, मनु और इक्ष्वाकु इन्हीं तीनों का उल्लेख कर दिया है। परन्तु इसका सच्चा अर्थ नारायणीय धर्म की समस्त परम्परा देखने से स्पष्ट मालूम हो जाता है। ब्रह्मा के कुल सात जन्म हैं। इनसे पहले छः जन्मों की, नारायणीय धर्म में कथित, परम्परा का वर्णन हो चुकने पर, जब ब्रह्मा के सातवें, अर्थात् वर्तमान जन्म का कृत-युग समाप्त हुआ, तब – त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान्मनवे ददौ। मनुश्च लोकभृत्यर्थं सुतायेक्ष्वाकवे ददौ॥ इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थि तः। गमिष्यति क्षयान्ते च पुनर्नारायणं नृप॥ यतीनां चापि यो धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम। कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पि तः॥ 'त्रेतायुग के आरम्भ में विवस्वान् ने मनु को (यह धर्म) दिया, मनु ने लोकधारणार्थ यह अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दिया, और इक्ष्वाकु से आगे सब लोगों में फैल गया। हे राजा! सृष्टि का क्षय होने पर (यह धर्म) फिर नारायण के यहाँ चला जावेगा। यह धर्म और 'यतीनां चापि' अर्थात् इसके साथ ही संन्यासधर्म भी तुझ से पहले भगवद्गीता में कह दिया है।' – ऐसा नारायणीय धर्म में ही वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा है (मभा॰ शां॰ 348.51 – 53)। इससे देख पड़ता है कि जिस द्वापरयुग के अन्त में भारतीय युद्ध हुआ था, उससे पहले के त्रेतायुग भर की ही भागवतधर्म की परम्परा गीता में वर्णित है; विस्तारभय से अधिक वर्णन नहीं किया है। यह भागवतधर्म ही योग या कर्मयोग है, और मनु को इस कर्मयोग के उपदेश किए जाने की कथा, न केवल गीता में है, प्रत्युत भागवतपुराण (8.24.55) में भी इस कथा का उल्लेख है, और मत्स्यपुराण के 52 वें अध्याय में मनु को उपदिष्ट कर्मयोग का महत्त्व भी बतलाया गया है। परन्तु इनमें से कोई भी वर्णन नारायणीयोपाख्यान में किए गए वर्णन के समान पूर्ण नहीं। विवस्वान्, मनु और इक्ष्वाकु की परम्परा सांख्यमार्ग को बिलकुल ही उपयुक्त नहीं होती और सांख्य एवं योग दोनों के अतिरिक्त तीसरी निष्ठा गीता में वर्णित ही नहीं है, इस बात पर लक्ष देने से दूसरी रीति से भी सिद्ध होता है, कि यह परम्परा कर्मयोग की ही है (गीता. 2.39)। परन्तु सांख्य और योग दोनों निष्ठाओं की परम्परा यद्यपि एक न हो, तो भी कर्मयोग अर्थात् भागवतधर्म के निरूपण में ही सांख्य या संन्यासनिष्ठा के निरूपण का पर्याय से समावेश हो जाता है (गीतार॰ पृ. 467 देखो)। इस कारण वैशम्पायन ने कहा है कि भगवद्गीता में यतिधर्म अर्थात् संन्यासधर्म भी वर्णित है। मनुस्मृति में चार आश्रम-धर्मों का जो वर्णन है, उसके छटे अध्याय में पहले यति अर्थात् संन्यास आश्रम का धर्म कह चुकने पर विकल्प से 'वेदसंन्यासिकों का कर्मयोग' इस नाम से गीता या भागवतधर्म के कर्मयोग का वर्णन है और स्पष्ट कहा है कि 'निःस्पृहता से अपना कार्य करते रहने से ही अन्त में परम सिद्धि मिलती है।' (मनु॰ 6.66)। इससे स्पष्ट देख पड़ता है कि कर्मयोग मनु को भी ग्राह्य था। इसी प्रकार अन्य स्मृतिकारों को भी यह मान्य था और इस विषय के अनेक प्रमाण गीतारहस्य के 11 वें प्रकरण के अन्त (पृ. 361 – 365) में दिए गए है। अब अर्जुन को इस परम्परा पर यह शंका है कि –
— Lokmanya Tilak