भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.२७ ·

English

मूल श्लोक

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

sarvāṇīndriyakarmāṇi prāṇakarmāṇi cāpare ātmasaṃyamayogāgnau juhvati jñānadīpite

४.२७अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक २७

अनुवाद

और कुछ लोग इन्द्रियों तथा प्राणों के सब कर्मों को अर्थात् व्यापारों को ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयमरूपी योग को अग्नि में हवन किया करते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इन श्लोकों में दो-तीन प्रकार के लाक्षणिक यज्ञों का वर्णन है; जैसे इन्द्रियों का संयमन करना अर्थात् उनको योग्य मर्यादा के भीतर अपने-अपने व्यवहार करने देना; (2) इन्द्रियों के विषय अर्थात् उपभोग के पदार्थ सर्वथा छोड़कर इन्द्रियों को बिलकुल मार डालना; (3) न केवल इन्द्रियों के व्यापार को, प्रत्युत प्राणों के भी व्यापार को बन्द कर पूरी समाधि लगा कर केवल आत्मानन्द में ही मग्न रहना। अब इन्हें यज्ञ की उपमा दी जाएँ तो पहले भेद में इन्द्रियों को मर्यादित करने की क्रिया (संयमन) अग्नि हुई; क्योंकि दृष्टान्त में यह कहा जा सकता है कि इस मर्यादा के भीतर जो कुछ आ जाएँ, इसका उसमें हवन हो गया। इसी प्रकार दूसरे भेद में साक्षात् इन्द्रियाँ होम-द्रव्य है और तीसरे भेद में इन्द्रियाँ एवं प्राण दोनों मिलकर होम करने के द्रव्य हो जाते है और आत्मसंयमन अग्नि होता है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग ऐसे हैं, जो निरा प्राणायाम ही किया करते है, उनका वर्णन उनतीसवें श्लोक में है। 'यज्ञ' शब्द के मूल अर्थ द्रव्यात्मक यज्ञ को लक्षणा से विस्तृत और व्यापक कर तप, संन्यास, समाधि एवं प्राणायाम प्रभृति भगवत्प्राप्ति के सब प्रकार के साधनों का एक 'यज्ञ' शीर्षक में ही समावेश कर दिया गया है। भगवद्गीता की यह कल्पना कुछ अपूर्व नहीं है। मनुस्मृति के चौथे अध्याय में गृहस्थाश्रम के वर्णन के सिलसिले में पहले यह बतलाया गया है कि ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और पितृयज्ञ – इस स्मार्त पंचमहायज्ञों को कोई गृहस्थ न छोड़े; और फिर कहा है, कि इनके बदल कोई-कोई 'इन्द्रियों में वाणी का हवन कर, वाणी में प्राण का करके, अन्त मे ज्ञानयज्ञ से भी परमेश्वर का यजन करते है' (मनु॰ 4.21 – 24)। इतिहास की दृष्टि से देखें तो विदित होता है, कि इन्द्र-वरुण प्रभृति देवताओं के उद्देश्य से जो द्रव्यमय यज्ञ श्रौत ग्रन्थों में कहे गए है, उनका प्रचार धीरे-धीरे घटता गया; और जब पातंजल-योग से, संन्यास से अथवा आध्यात्मिक ज्ञान से परमेश्वर की प्राप्ति कर लेने के मार्ग अधिक-अधिक प्रचलित होने लगें तब, 'यज्ञ' ही शब्द का अर्थ विस्तृत कर उसी में मोक्ष के समग्र उपायों का लक्षणा से समावेश करने का आरम्भ हुआ होगा। इसका मर्म यही है, कि पहले जो शब्द धर्म की दृष्टि से प्रचलित हो गए थे, उन्हीं का उपयोग अगले धर्मा र्ग के लिए भी किया जावें। कुछ भी हो, मनुस्मृति के विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है, कि गीता के पहले, यह अन्ततः उस काल में, उक्त कल्पना सर्वमान्य हो चुकी थी।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.२७