भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.२५ ·

English

मूल श्लोक

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

daivamevāpare yajñaṃ yoginaḥ paryupāsate brahmāgnāvapare yajñaṃ yajñenaivopajuhvati

४.२५अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक २५

अनुवाद

कोई-कोई (कर्म-)योगी (ब्रह्मबुद्धि के बदले) देवता आदि के उद्देश्य से यज्ञ किया करते है; और कोई (ब्रह्माग्नि ) यज्ञ से ही यज्ञ का यजन करते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

पुरुष सूक्त में विराटरूपी यज्ञ पुरुष के देवताओं द्वारा, यजन होने का जो वर्णन है – 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः।' (ऋ॰ 10.90.16), उसी को लक्ष्य कर इस श्लोक का उत्तरार्ध कहा गया है 'यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति' ये पद ऋग्वेद के 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त' से समानार्थक ही दी पड़ते है। प्रकट है, कि इस यज्ञ में (जो सृष्टि के आरम्भ में हुआ था) जिस विराटरूपी पशु का हवन किया गया था, वह पशु, और जिस देवता का यजन किया गया था, वह देवता, यो दोनों ब्रह्मस्वरूपी ही होंगे। सारांश, चौबीसवें श्लोक का यह वर्णन ही तत्त्व दृष्टि से ठीक है, कि सृष्टि के सब पदार्थों में सदैव ही ब्रह्म भरा हुआ है, इस कारण इच्छा रहित बुद्धि से सब व्यवहार करते-करते ब्रह्म से ही ब्रह्म का सदा यजन होता रहता है; केवल बुद्धि वैसी होनी चाहिए। पुरुषसूक्त को लक्ष्य कर गीता में वही एक श्लोक नहीं है; प्रत्युत आगे दसवें अध्याय में भी (10.42) इस सूक्त के अनुसार वर्णन है। देवता के उद्देश्य से किए हुए यज्ञ का वर्णन हो चुका; अब अग्नि , हवि इत्यादि शब्दों के लाक्षणिक अर्थ लेकर बतलाते है, कि प्राणायाम आदि पातंजलयोग की क्रियाएँ अथवा तपश्चरण भी एक प्रकार का यज्ञ होता है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.२५