मूल श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śrībhagavānuvāca imaṃ vivasvate yogaṃ proktavānahamavyayam vivasvānmanave prāha manurikṣvākave'bravīt
अनुवाद
श्रीभगवान ने कहा: अव्यय अर्थात् कभी भी क्षीण न होनेवाला अथवा त्रिकाल में भी अबाधित और नित्य यह (कर्म-) योग (-मार्ग) मैंने विवस्वान् अर्थात् सूर्य को बतलाया था; विवस्वान् ने (अपने पुत्र) मनु को और मनु ने (अपने पुत्र) इक्ष्वाकु को बतलाया।