भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ३.२६ ·

English

मूल श्लोक

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

na buddhibhedaṃ janayedajñānāṃ karmasaṅginām joṣayetsarvakarmāṇi vidvānyuktaḥ samācaran

३.२६अध्याय ३ · कर्मयोग४३ में से श्लोक २६

अनुवाद

कर्म में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में ज्ञानी पुरुष भेद-भाव उत्पन्न न करें; (आप स्वयं) युक्त अर्थात् योगयुक्त होकर सभी काम करें और लोगों से खुशी से करावे।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक का यह अर्थ है कि अज्ञानियों की बुद्धि में भेद-भाव उत्पन्न न करें और आगे चलकर 29 वें श्लोक में भी यही बात फिर से कही गई है। परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि लोगों को अज्ञान में बनाए रखे। 25 वें श्लोक में कहा है कि ज्ञानी पुरुष को लोकसंग्रह करना चाहिए, और लोकसंग्रह ही करना हो, तो फिर यह आवश्यक नहीं कि ज्ञानी पुरुष स्वयं कर्म करें; लोगों को समझा देने – ज्ञान का उपदेश कर देने – से भी काम चल जाता है। इसका भगवान यह उत्तर देते हैं, कि जिनको सदाचरण का दृढ़ अभ्यास हो नहीं गया है, (और साधारण लोग ऐसे ही होते है) उनको यदि केवल मुँह से उपदेश किया जाएँ – सिर्फ ज्ञान बतला दिया जाएँ – तो वे अपने अनुचित बर्ताव के समर्थन में ही ब्रह्मज्ञान का दुरुपयोग किया करते है; और वे उलटे, ऐसी व्यर्थ बातें कहते-सुनते सदैव देखे जाते है, कि 'अमुक ज्ञानी पुरुष तो ऐसा कहता है।' इसी प्रकार यदि ज्ञानी पुरुष कर्मों को एकाएक छोड़ बैठे, तो वह अज्ञानी लोगों को निरुपयोगी बनाने के लिए एक उदाहरण बन जाता है। मनुष्य का उस प्रकार बातूनी, गोच-पेंच लड़ाने वाला अथवा निरुपयोगी हो जाना ही बुद्धि-भेद है; और मनुष्य की बुद्धि में इस प्रकार से भेदभाव उत्पन्न कर देना ज्ञाता पुरुष को उचित नहीं है। अतएव गीता ने यह सिद्धान्त किया है, कि जो पुरुष ज्ञानी हो जाएँ, वह लोक-संग्रह के लिए – लोगों को चतुर और सदाचरणी बनाने के लिए – स्वयं संसार में रहकर निष्काम कर्म अर्थात् सदाचरण का प्रत्यक्ष नमूना लोगों को दिखलावे और तदनुसार उनसे आचरण करावे। इस जगत में उसका यही बड़ा महत्त्वपूर्ण काम है (देखो. गीतार॰ पृ. 401)। किन्तु गीता के इस अभिप्राय को बे-समझे-बुझे कुछ टीकाकार इस का यों विपरीत अर्थ किया करते है कि 'ज्ञानी पुरुष को अज्ञानियों के समान ही कर्म करने का स्वाँग इसलिए करना चाहिए, जिसमें कि अज्ञानी लोग नादान बने रह कर ही अपने कर्म करते रहे!' मानो दम्भाचरण सिखलाने अथवा लोगों को अज्ञानी बने रहने देकर जानवरों के समान उनसे कर्म करा देने के लिए ही गीता प्रवृत्त हुई है! जिनका यह दृढ़ निश्चय है कि ज्ञानी पुरुष कर्म न करें, सम्भव है कि उन्हें लोकसंग्रह एक ढोंग सा प्रतीत हो; परन्तु गीता का वास्तविक अभिप्राय ऐसा नहीं है। भगवान कहते है कि ज्ञानी पुरुष के कामों में लोकसंग्रह एक महत्त्वपूर्ण काम है; और ज्ञानी पुरुष अपने उत्तम आदर्श के द्वारा उन्हें सुधारने के लिए –नादान बनाए रखने के लिए नहीं – कर्म ही किया करें (देखो गीतारहस्य प्र॰ 11.12) अब यह शंका हो सकती है, कि यदि आत्मज्ञानी पुरुष इस प्रकार लोकसंग्रह के लिए सांसारिक कर्म करने लगे, तो वह भी अज्ञानी बन जाएगा, अतएव स्पष्ट कर बतलाते है, कि यद्यपि ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही संसारी बन जाएँ, तथापि इन दोनों के बर्ताव में भेद क्या है और ज्ञानवान् से अज्ञानी को किस बात की शिक्षा लेनी चाहिए –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ३, श्लोक ३.२६