मूल श्लोक
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
utsīdeyurime lokā na kuryāṃ karma cedaham saṅkarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ
अनुवाद
जो मैं कर्म न करूँ तो सारे लोक अर्थात् उत्सन्न अर्थात् नष्ट हो जावेंगे, मैं संकरकर्ता होऊँगा और इस प्रजाजनों का मेरे हाथ से नाश होगा।
टिप्पणी
भगवान ने स्वयं अपना उदाहरण देकर इस श्लोक में भली-भाँति स्पष्ट कर दिखला दिया है, कि लोकसंग्रह कुछ पाखण्ड नहीं है। इसी प्रकार हमने ऊपर 17 से 19 वें श्लोक तक का जो यह अर्थ किया है कि ज्ञान प्राप्त हो जाने पर कुछ कर्तव्य भले न रह गया हो, फिर भी ज्ञाता को निष्काम बुद्धि से सारे कर्म करते रहना चाहिए, वह भी स्वयं भगवान के इस दृष्टान्त से पूर्णतया सिद्ध हो जाता है। यदि ऐसा न हो तो यह दृष्टान्त भी निरर्थक हो जाएगा (देखो गी॰ र॰ पृ. 322 – 323)। सांख्यमार्ग और कर्मयोग में यह भारी भेद है कि सांख्यमार्ग के ज्ञानी पुरुष सारे कर्म छोड़ बैठते है; फिर चाहे इस कर्म-त्याग से यज्ञ-चक्र डूब जाएँ और जगत का कुछ भी हुआ करें – उन्हें इसकी कुछ परवा नहीं होती; और कर्मा र्ग के ज्ञानी पुरुष, स्वयं अपने लिए आवश्यक न भी हो भी, लोकसंग्रह को महत्त्वपूर्ण आवश्यक साध्य समझकर, तदर्थ अपने धर्म के अनुसार सारे काम किया करते है (देखो गीतारहस्य प्रकरण 11 पृ. 352 – 355)। यह बतला दिया गया कि स्वयं भगवान क्या है; अब ज्ञानियों और अज्ञानियों के कर्मों का भेद दिखलाकर बतलाते है, कि अज्ञानियों को सुधारने के लिए ज्ञाता का आवश्यक कर्तव्य क्या है –
— Lokmanya Tilak