भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.७२ ·

English

मूल श्लोक

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṃ prāpya vimuhyati sthitvā'syāmantakāle'pi brahma nirvāṇamṛcchati

२.७२अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ७२

अनुवाद

हे पार्थ! ब्राह्मी स्थिति यही है। इसे पा जाने पर कोई भी मोह में नहीं फँसता; और अन्तकाल में अर्थात् मरने के समय में भी इस स्थित में रह कर ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् ब्रह्म में मिल जाने के स्वरूप का मोक्ष पाता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यहाँ ब्राह्मी स्थिति कर्मयोग की अन्तिम और अत्युत्तम स्थिति है (देखो गी॰ र॰ प्र॰ 9 पृ. 233 और 249); और इसमें विशेषता यह है कि इसमें प्राप्त हो जाने से फिर मोह नहीं होता। यहाँ पर इस विशेषता के बतलाने का कुछ कारण है। वह यह कि यदि किसी दिन दैवयोग से घड़ी-दो-घड़ी के लिए इस ब्राह्मी स्थिति का अनुभव हो सके, तो उससे कुछ चिरकालिक लाभ नहीं होता। क्योंकि किसी भी मनुष्य की यदि मरते समय यह स्थिति न रहेगी, तो मरणकाल में जैसी वासना रहेगी उसी के अनुसार पुनर्जन्म होगा (देखो, गीतारहस्य पृ.288)। यही कारण है जो ब्राह्मी स्थिति का वर्णन करते हुए इस श्लोक में स्पष्टतया कह दिया है कि 'अन्तकालेऽपि' = अन्तकाल में भी स्थितप्रज्ञ की यह अवस्था स्थिर बनी रहता है। अन्तकाल में मन के शुद्ध रहने की विशेष आवश्यकता का वर्णन उपनिषदों में (छां॰ 3.14.1; प्र॰ 3.10) और गीता में भी (गी॰ 8.5 – 10) है। यह वासनात्मक कर्म अगले अनेक जन्मों के मिलने का कारण है, इसलिए प्रगट ही है, कि अन्ततः मरने के समय तो वासना शून्य हो जाती चाहिए। और फिर यह भी कहना पड़ता है किस मरण-समय में वासना शून्य होने के लिए पहले से ही वैसा अभ्यास हो जाना चाहिए। क्योंकि वासना को शून्य करने का कर्म अत्यन्त कठिन है, और बिना ईश्वर की विशेष कृपा के उसका किसी को भी प्राप्त हो जाना न केवल कठिन है वरन् असम्भव भी है। यह तत्त्व वैदिकधर्म में ही नहीं है, कि मरण समय में वासना शुद्ध होनी चाहिए; किन्तु अन्यान्य धर्मों में भी यह तत्त्व अंगीकृत हुआ है। देखो गीतारहस्य पृ. 439)

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.७२