भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.३४ ·

English

मूल श्लोक

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

akīrtiṃ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te'vyayām sambhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyate

२.३४अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ३४

अनुवाद

यही नहीं, बल्कि (सब) लोग तेरी अक्षय्य दुष्कीर्ति गाते रहेंगे! और अपयश तो सम्भावित पुरुष के लिए मृत्यु से भी बढ़कर है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

श्रीकृष्ण ने यही तत्त्व उद्योगपर्व में युधिष्ठिर को भी बतलाया है (मभा॰ उ॰ 72.24) वहाँ यह श्लोक है - 'कुलीनस्य च या निन्दा वधो वाऽमित्रकर्षणम्। महागुणो वधो राजन् न तु निन्दा कुजीविका॥' परन्तु गीता में इसकी अपेक्षा यह अर्थ संक्षेप में है; और गीता ग्रन्थ का प्रचार भी अधिक है इस कारण गीता के 'सम्भावितस्य.' इत्यादि वाक्य का कहावत का-सा उपयोग होने लगा है। गीता के और बहुतेरे श्लोक भी इसी के समान सर्वसाधारण लोगों में प्रचलित हो गए हैं। अब दुष्कीर्ति का स्वरूप बतलाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.३४