मूल श्लोक
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
akīrtiṃ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te'vyayām sambhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyate
अनुवाद
यही नहीं, बल्कि (सब) लोग तेरी अक्षय्य दुष्कीर्ति गाते रहेंगे! और अपयश तो सम्भावित पुरुष के लिए मृत्यु से भी बढ़कर है।
टिप्पणी
श्रीकृष्ण ने यही तत्त्व उद्योगपर्व में युधिष्ठिर को भी बतलाया है (मभा॰ उ॰ 72.24) वहाँ यह श्लोक है - 'कुलीनस्य च या निन्दा वधो वाऽमित्रकर्षणम्। महागुणो वधो राजन् न तु निन्दा कुजीविका॥' परन्तु गीता में इसकी अपेक्षा यह अर्थ संक्षेप में है; और गीता ग्रन्थ का प्रचार भी अधिक है इस कारण गीता के 'सम्भावितस्य.' इत्यादि वाक्य का कहावत का-सा उपयोग होने लगा है। गीता के और बहुतेरे श्लोक भी इसी के समान सर्वसाधारण लोगों में प्रचलित हो गए हैं। अब दुष्कीर्ति का स्वरूप बतलाते है –
— Lokmanya Tilak