मूल श्लोक
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
etānyapi tu karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matamuttamam
अनुवाद
अतएव इन (यज्ञ, दान आदि) कर्मों को भी बिना आसक्ति रखे, फलों का त्याग करके (अन्य निष्काम कर्मों के समान ही लोकसंग्रह हेतु) करते रहना चाहिए। हे पार्थ! इस प्रकार मेरा निश्चित मत (है, तथापि) उत्तम है।
टिप्पणी
कर्म का दोष अर्थात् बन्धकता कर्म में नहीं, फलाशा में है। इसलिए पहले अनेक बार जो कर्मयोग का यह तत्त्व कहा गया है कि सभी कर्मों को फलाशा छोड़ कर निष्काम-बुद्धि से करना चाहिए, उसका यह उपसंहार है। संन्यासमार्ग का यह मत गीता को मान्य नहीं है कि सब कर्म दोषयुक्त, अतएव त्याज्य है (देखो गी॰ 18.48 – 49)। गीता केवल काम्य कर्मों का संन्यास करने के लिए कहती है; परन्तु धर्मशास्त्र में जिन कर्मों का प्रतिपादन है, वे सभी काम्य ही है (गी॰ 2.42 – 44), इसलिए अब कहना पड़ता है कि उनका भी संन्यास करना चाहिए; और यदि ऐसा करते है तो यह यज्ञ-चक्र बन्द हुआ जाता है (3.16) एवं इससे सृष्टि के उद्ध्वस्त होने का भी अवसर आया जाता है। प्रश्न होता है कि तो फिर करना क्या चाहिए? गीता इसका यों उत्तर देती है, कि यज्ञ, दान प्रभृति कर्म स्वर्गादि-फलप्राप्ति के हेतु करने के लिए यद्यपि शास्त्र में कहा है, तथापि ऐसी बात नहीं है कि ये ही कर्म लोकसंग्रह के निमित्त स्वधर्म के अनुसार जैसे अन्यान्य निष्काम कर्म किए जाते है वैसे ही यज्ञ, दान आदि कर्मों को भी फलाशा और आसक्ति छोड़कर करना चाहिए। क्योंकि वे सदैव 'पावन' अर्थात् चित्तशुद्धि-कारक अथवा परोपकार-बुद्धि बढ़ानेवाले हैं। मूल श्लोक में जो 'एतान्यपि = ये भी' शब्द है उनका अर्थ यही है कि 'अन्य निष्काम कर्मों के समान यज्ञ, दान आदि कर्म करना चाहिए।' इस रीति से ये सब कर्म फलाशा छोड़कर अथवा भक्ति - दृष्टि से केवल परमेश्वरार्पण बुद्धिपूर्वक किए जावें तो सृष्टि का चक्र चलता रहेगा, और कर्ता के मन की फलाशा छूट जाने के कारण ये कर्म मोक्ष-प्राप्ति में बाधा भी नहीं डाल सकते। इस प्रकार सब बातों का ठीक-ठीक मेल मिल जाता है। कर्म के विषय में कर्मयोगशास्त्र का यही अन्तिम और निश्चित सिद्धान्त है (गी॰ 2.45 पर हमारी टिप्पणी देखो)। मीमांसकों के कर्मयोग और गीता के कर्मयोग का भेद गीतारहस्य (पृ. 292 – 295 और पृ. 344 – 346) में अधिक स्पष्टता से दिखाया गया है। अर्जुन के प्रश्न करने पर संन्यास और त्याग के अर्थों का कर्मयोग की दृष्टि से इस प्रकार स्पष्टीकरण हो चुका। अब सात्त्विक आदि भेदों के अनुसार कर्म करने की भिन्न-भिन्न रीतियों का वर्णन करके उसी अर्थ को दृढ़ करते है –
— Lokmanya Tilak