मूल श्लोक
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ saṃnyāsenādhigacchati
अनुवाद
अतएव कहीं भी आसक्ति न रख कर, मन को वश में करके निष्काम बुद्धि से चलने पर (कर्म-फल के) संन्यास द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त हो जाती है।
टिप्पणी
इस उपसंहारात्मक अध्याय में पहले बतलाए हुए उन्हीं विचारों को अब फिर से व्यक्त कर दिखलाया है कि पराए धर्म की अपेक्षा स्वधर्म भला है (गी॰ 3.35) और नैष्कर्म्य-सिद्धि पाने के लिए कर्म छोड़ने की आवश्यकता नहीं है (गी॰3.4) इत्यादि। हम गीता के तीसरे अध्याय में चौथे श्लोक की टिप्पणी में ऐसे प्रश्नों का स्पष्टीकरण कर चुके है कि नैष्कर्म्य क्या वस्तु है और सच्ची नैष्कर्म्य-सिद्धि किसे कहना चाहिए। उक्त सिद्धान्त की महत्ता इस बात पर ध्यान दिए रहने से सहज ही समझ में आ जावेगी, कि संन्यासमार्ग वालों की दृष्टि केवल मोक्ष पर ही रहती है और भगवान की दृष्टि मोक्ष एवं लोकसंग्रह दोनों पर समान ही है। लोकसंग्रह के लिए अर्थात् समाज के धारण और पोषण के निमित्त ज्ञान-विज्ञानयुक्त पुरुष, अथवा रण में तलवार का जौहर दिखलाने वाले शूर क्षत्रिय, तथा किसान, वैश्य, रोजगारी, लुहार, बढ़ई, कुम्हार और मांसविक्रेता व्याध तक की भी आवश्यकता है। परन्तु यदि कर्म छोड़े बिना सचमुच मोक्ष नहीं मिलता, तो सब लोगों को अपना-अपना व्यवसाय छोड़ कर संन्यासी बन जाना चाहिए। कर्म-संन्यासमार्ग के लोग इस बात की ऐसी कुछ परवा नहीं करते। परन्तु गीता की दृष्टि इतनी संकुचित नहीं है, इसलिए गीता कहती है, कि अपने अधिकार के अनुसार प्राप्त हुए व्यवसाय को छोड़ कर; दूसरे के व्यवसाय को भला समझ करके करने लगना उचित नहीं है। कोई भी व्यवसाय लीजिए, उसमें कुछ न कुछ त्रुटि अवश्य रहती ही है। जैसे ब्राह्मण के लिए विशेषतः विहित जो क्षान्ति है (18.42), उसमें भी एक बड़ा दोष यह है कि 'क्षमावान पुरुष दुर्बल समझा जाता है' (मभा॰ वन॰ 160.34), और व्याध के पेशे में मांस बेचना भी एक झंझट ही है (मभा॰ वन॰ 206)। परन्तु इन कठिनाइयों से उकता कर कर्म को ही छोड़ बैठना उचित नहीं है। किसी भी कारण से क्यों न हो जब एक बार किसी कर्म को अपना लिया, तो फिर उसकी कठिनाई या अप्रियता की परवा न करके, उसे आसक्ति छोड़ कर करना ही चाहिए। क्योंकि मनुष्य की लघुता-महत्ता उसके व्यवसाय पर निर्भर नहीं है, किन्तु जिस बुद्धि से वह अपना व्यवसाय या कर्म करता है उसी बुद्धि पर उसकी योग्यता अध्यात्म-दृष्टि से अवलम्बित रहती है (गी॰2.46)। जिसका मन शान्त है, और जिसने सब प्राणियों के अन्तर्गत एकता को पहचान लिया है, वह मनुष्य जाति या व्यवसाय से चाहे व्यापारी हो, चाहे कसाई; निष्काम बुद्धि से व्यवसाय करनेवाला वह मनुष्य स्नान-सन्ध्याशील ब्राह्मण, अथवा शूर क्षत्रिय की बराबरी का माननीय और मोक्ष का अधिकारी है। यही नहीं, वरन् 49 वें श्लोक में स्पष्ट कहा है कि कर्म छोड़ने से जो सिद्धि प्राप्त की जाती है, वही निष्काम बुद्धि से अपना-अपना व्यवसाय करनेवालों को भी मिलती है। भागवत-धर्म का जो कुछ रहस्य है, वह यही है; तथा महाराष्ट्र देश के साधु-सन्तों के इतिहास से स्पष्ट होता है, कि उक्त रीति से आचरण करके निष्काम-बुद्धि के तत्त्व को अमल में लाना कुछ असम्भव नहीं है (देखो गीतार॰ पृ.438)। अब बतलाते है, कि अपने-अपने कर्मों में तत्पर रहने से ही अन्त में मोक्ष कैसे प्राप्त होता है–
— Lokmanya Tilak