भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.३३ ·

English

मूल श्लोक

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

dhṛtyā yayā dhārayate manaḥprāṇendriyakriyāḥ yogenāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī

१८.३३अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ३३

अनुवाद

हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी अर्थात् इधर उधर न डिगने वाली धृति से मन, प्राण और इन्द्रियों के व्यापार, (कर्मफल-त्यागरूपी) योग के द्वारा (पुरुष) करता है, वह धृति सात्त्विक है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.३३