मूल श्लोक
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
dhṛtyā yayā dhārayate manaḥprāṇendriyakriyāḥ yogenāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī
अनुवाद
हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी अर्थात् इधर उधर न डिगने वाली धृति से मन, प्राण और इन्द्रियों के व्यापार, (कर्मफल-त्यागरूपी) योग के द्वारा (पुरुष) करता है, वह धृति सात्त्विक है।