मूल श्लोक
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसा वृता ।सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
adharmaṃ dharmamiti yā manyate tamasā vṛtā sarvārthān viparītāṃśca buddhiḥ sā pārtha tāmasī
अनुवाद
हे पार्थ! वह बुद्धि तामसी है, कि जो तम से व्याप्त होकर अधर्म को धर्म समझती है और सब बातों में विपरीत यानी उलटी समझ कर देती है।
टिप्पणी
इस प्रकार बुद्धि के विभाग करने पर सदसद्विवेक-बुद्धि कोई स्वतन्त्र देवता नहीं रह जाती, किन्तु सात्त्विक बुद्धि में ही उसका समावेश हो जाता है। यह विवेचन गीतारहस्य के पृष्ठ 141 में किया गया है। बुद्धि के विभाग हो चुके; अब धृति के विभाग बतलाते है –
— Lokmanya Tilak