भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.३२ ·

English

मूल श्लोक

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसा वृता ।सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

adharmaṃ dharmamiti yā manyate tamasā vṛtā sarvārthān viparītāṃśca buddhiḥ sā pārtha tāmasī

१८.३२अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ३२

अनुवाद

हे पार्थ! वह बुद्धि तामसी है, कि जो तम से व्याप्त होकर अधर्म को धर्म समझती है और सब बातों में विपरीत यानी उलटी समझ कर देती है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस प्रकार बुद्धि के विभाग करने पर सदसद्विवेक-बुद्धि कोई स्वतन्त्र देवता नहीं रह जाती, किन्तु सात्त्विक बुद्धि में ही उसका समावेश हो जाता है। यह विवेचन गीतारहस्य के पृष्ठ 141 में किया गया है। बुद्धि के विभाग हो चुके; अब धृति के विभाग बतलाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.३२