मूल श्लोक
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭho naiṣkṛtiko'lasaḥ viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyate
अनुवाद
अयुक्त अर्थात् चंचल बुद्धिवाला, असभ्य, गर्व से फूलने वाला, ठग, नैष्कृतिक यानी दूसरों की हानि करनेवाला, आलसी, अप्रसन्नचित्त और दीर्घसूत्री अर्थात् देरी लगानेवाला या घड़ी भर के काम को महीने भर में करनेवाला कर्ता तामस कहलाता है।
टिप्पणी
28 वें श्लोक में नैष्कृतिक (निस् + कृत = छेदन करना, काटना) शब्द का अर्थ दूसरों के काम छेदन करनेवाला अथवा नाश करनेवाला है। परन्तु इसके बदले कई लोग 'नैकृतिक' पाठ मानते है। अमरकोश में 'निकृत' का अर्थ शठ लिखा हुआ है। परन्तु इस श्लोक में शठ विशेषण पहले आ चुका है, इसलिए हमने नैष्कृतिक पाठ को स्वीकार किया है। इन तीन प्रकार के कर्ताओं में से सात्त्विक कर्ता ही अकर्ता, अलिप्त, अथवा कर्मयोगी है। ऊपरवाले श्लोक से प्रगट है कि फलाशा छोड़ने पर भी कर्म करने की आशा, उत्साह और सारासार-विचार उस कर्मयोगी में बना ही रहता है। जगत के त्रिविध विस्तार का यह वर्णन ही अब बुद्धि, धृति और सुख के विषय में भी किया जाता है। इन श्लोकों में बुद्धि का अर्थ वही व्यवसायात्मिका बुद्धि अथवा निश्चय करने वाली इन्द्रिय अभीष्ट है, कि जिसका वर्णन दूसरे अध्याय (2.41) में हो चुका है। इसका स्पष्टीकरण गीतारहस्य के छठे प्रकरण (पृ. 138 – 141) में किया गया है।
— Lokmanya Tilak