भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.२५ ·

English

मूल श्लोक

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

anubandhaṃ kṣayaṃ hiṃsāmanapekṣya ca pauruṣam mohādārabhyate karma yattattāmasamucyate

१८.२५अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक २५

अनुवाद

तामस कर्म वह है जा मोह से बिना इन बातों का विचार किए आरम्भ किया जाता है, कि अनुबन्धक अर्थात् आगे क्या होगा, पौरुष यानी अपना सामर्थ्य कितना है और (होनहार में) नाश अथवा हिंसा होगी या नहीं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इन तीन भाँति के कर्मों में सभी प्रकार के कर्मों का समावेश हो जाता है। निष्काम कर्म को ही सात्त्विक अथवा उत्तम क्यों कहा है, इसका विवेचन गीतारहस्य के ग्यारहवें प्रकरण में किया गया है उसे देखो, और अकर्म भी सचमुच यही है (गी॰ 4.16 पर हमारी टिप्पणी देखो)। गीता का सिद्धान्त है कि कर्म की अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है, अतः कर्म के उक्त लक्षणों का वर्णन करते समय बार-बार कर्त्ता की बुद्धि का उल्लेख किया गया है। स्मरण रहे, कि कर्म का सात्त्विकपन या तामसपन केवल उनके बाह्य परिणाम से निश्चित नहीं किया गया है (देखो गीतार॰ पृ.380 – 381)। इसी प्रकार 25 वें श्लोक से यह भी सिद्ध है, कि फलाशा के छूट जाने पर यह न समझना चाहिए कि अगला-पिछला या सारासार विचार किए बिना ही मनुष्य को चाहे जो कर्म करने की छुट्टी हो गई। क्योंकि 25 वें श्लोक में यह निश्चय किया है, कि अनुबन्धक और फल का विचार किए बिना जो कर्म किया जाता है वह तामस है, न कि सात्त्विक (गीतार॰ पृ. 380 – 381 देखो)। अब इसी तत्त्व के अनुसार कर्ता के भेद बतलाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.२५