मूल श्लोक
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sarvabhūteṣu yenaikaṃ bhāvamavyayamīkṣate avibhaktaṃ vibhakteṣu tajjñānaṃ viddhi sāttvikam
अनुवाद
जिस ज्ञान से यह मालूम होता है, कि विभक्त अर्थात् भिन्न-भिन्न सब प्राणियों में एक ही अविभक्त और अव्यय भाव अथवा तत्त्व है, उसे सात्त्विक ज्ञान जानो।