मूल श्लोक
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
jñānaṃ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhedataḥ procyate guṇasaṅkhyāne yathāvacchṛṇu tānyapi
अनुवाद
गुणसंख्यानशास्त्र में अर्थात् कापिलसांख्यशास्त्र में कहा है, कि ज्ञान, कर्म और कर्ता (प्रत्येक सत्त्व, रज और तम इन तीन) गुणों के भेदों से तीन प्रकार के है। उन (प्रकारों) को ज्यों के त्यों (तुझे बतलाता हूँ) सुन।
टिप्पणी
कर्मचोदना और कर्मसंग्रह पारिभाषिक शब्द हैं। इन्द्रियों के द्वारा कोई भी कर्म होने के पूर्व मन में उसका निश्चय करना पड़ता है। अतएव इस मानसिक विचार को 'कर्मचोदना' अर्थात् कर्म करने की प्राथमिक प्रेरणा कहते है। और, वह स्वभावतः ज्ञान, ज्ञेय एवं ज्ञाता के रूप से तीन प्रकार की होती है। एक उदाहरण लीजिए – प्रत्यक्ष घड़ा बनाने के पूर्ण कुम्हार (ज्ञाता) अपने मन में निश्चय करता है, कि मुझे अमुक बात (ज्ञेय) करनी है, और वह अमुक रीति से (ज्ञान) होगी। यह क्रिया कर्मचोदना हुई। इस प्रकार मन का निश्चय हो जाने पर वह कुम्हार (कर्ता) मिट्टी, चाक इत्यादि साधन (करण) इकट्ठे कर प्रत्यक्ष घड़ा (कर्म) तैयार करता है। यह कर्मसंग्रह हुआ। कुम्हार का कर्म घट है तो; पर उसी को मिट्टी का कार्य भी कहते है। इससे मालूम होगा, कि कर्मचोदना शब्द से मानसिक अथवा अंतःकरण की क्रिया का बोध होता है और कर्मसंग्रह शब्द से उसी मानसिक क्रिया की जोड़ की बाह्य क्रियाओं का बोध होता है। किसी भी कर्म का पूर्ण विचार करना हो तो, 'चोदना' और 'संग्रह' दोनों का विचार करना चाहिए। इनसे से ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता (क्षेत्रज्ञ) के लक्षण प्रथम ही तेरहवें अध्याय (13.18) में अध्यात्म दृष्टि से बतला आए है। परन्तु क्रियारूपी ज्ञान का लक्षण कुछ पृथक होने के कारण अब इस त्रयी में से ज्ञान की, और दूसरी त्रयी में से कर्म एवं कर्ता की व्याख्याएँ दी जाती है–
— Lokmanya Tilak