भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.१७ ·

English

मूल श्लोक

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yasya nāhaṃkṛto bhāvo buddhiryasya na lipyate hatvā'pi sa imām̐llokānna hanti na nibadhyate

१८.१७अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक १७

अनुवाद

जिसे यह भावना ही नहीं है कि 'मैं कर्ता हूँ' तथा जिसकी बुद्धि अलिप्त है, वह यदि इन लोगों को मार डाले तथापि (समझना चाहिए कि ) उसने किसी को नहीं मारा और यह (कर्म) उसे बन्धक भी नहीं होता।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

कई टीकाकारों नें तेरहवें श्लोक के 'सांख्य' शब्द का अर्थ वेदान्तशास्त्र किया है। परन्तु अगला अर्थात् चौदहवें श्लोक नारायणीधर्म (मभा॰ शां॰ 347.87) में अक्षरशः आया है, और वहाँ उसके पूर्व कापिल सांख्य के तत्त्व-प्रकृति और पुरुष – का उल्लेख है। अतः हमारा यह मत है कि 'सांख्य' शब्द के इस स्थान में कापिल सांख्यशास्त्र ही अभिप्रेत है। पहले गीता में यह सिद्धान्त अनेक बार कहा गया है, कि मनुष्य को न तो कर्मफल की आशा करनी चाहिए और न ऐसी अहंकारबुद्धि मन में रखनी चाहिए कि मैं अमुक करूँगा (गी॰ 2.19, 2.47, 3.28, 5.8 – 11, 13.29)। यहाँ पर वही सिद्धान्त यह कह कर दृढ़ किया गया है कि 'कर्म का फल होने के लिए मनुष्य ही अकेला कारण नहीं है' (देखो. गीतार॰ प्र.11) चौदहवें श्लोक का अर्थ यह है कि मनुष्य इस जगत में हो या हो, प्रकृति के स्वभाव के अनुसार जगत का अखंडित व्यापार चलता ही रहता है, और जिस कर्म को मनुष्य अपनी करतूत समझता है, वह केवल उसी के यत्न का फल नहीं है, वरन् उसके यत्न और संसार के अन्य व्यापारों अथवा चेष्टाओं की सहायता का परिणाम है। जैसे कि खेती केवल मनुष्य के ही यत्न पर निर्भर नहीं है, उसकी सफलता के लिए धरती, बीज, पानी, खाद और बैल आदि के गुण-धर्म अथवा व्यापारों की सहायता आवश्यक होती है; इसी प्रकार, मनुष्य के प्रयत्न की सिद्धि होने के लिए जगत के जिन विविध व्यापारों की सहायता आवश्यक है, उनमें से कुछ व्यापारों को जान कर, उनकी अनुकूलता पाकर ही मनुष्य यत्न किया करता है। परन्तु हमारे प्रयत्नों के लिए अनुकूल अथवा प्रतिकूल, सृष्टि के और भी कई व्यापार हैं कि जिनका हमें ज्ञान नहीं है। इसी को दैव कहते है, और कर्म की घटना का यह पाँचवाँ कारण कहा गया है। मनुष्य का यत्न सफल होने के लिए जब इतनी सब बातों की आवश्यकता है तथा जब उनमें से कई या तो हमारे वश की नहीं या हमें ज्ञात भी नहीं रहती, तब यह बात स्पष्टता सिद्ध होती है, कि मनुष्य का ऐसा अभिमान रखना निरी मूर्खता है कि मैं अमुक काम करूँगा, अथवा ऐसी फलाशा रखना भी मूर्खता का लक्षण है कि मेरे कर्म फल अमुक ही होना चाहिए (देखो गीतार॰ पृ. 326 – 327)। तथापि सत्रहवें श्लोक का अर्थ यो भी न समझ लेना चाहिए कि जिसकी फलाशा छूट जाएँ, वह चाहे जो कुकर्म कर सकता है। साधारण मनुष्य जो कुछ करते हैं, वह स्वार्थ से लोभ से करते हैं, इसलिए उनका बर्ताव अनुचित हुआ करता है। परन्तु जिसका स्वार्थ या लोभ नष्ट हो गया है अथवा फलाशा पूर्णतया विलीन हो गई है, और जिसे प्राणिमात्र समान ही हो गए हैं, उससे किसी का भी अनहित नहीं हो सकता। कारण यह है कि दोष बुद्धि में रहता है, न कि कर्म में। अतएव जिसकी बुद्धि पहले से शुद्ध और पवित्र हो गई हो, उसका किया हुआ कोई कर्म यद्यपि लौकि क दृष्टि से विपरीत भले ही दिखलाई दे तो भी न्यायतः कहना पड़ता है कि उसका बीज शुद्ध ही होगा; फलतः उस काम के लिए फिर उस शुद्ध बुद्धिवाले मनुष्य को जवाबदार न समझना चाहिए। सत्रहवें श्लोक का यही तात्पर्य है। स्थितप्रज्ञ, अर्थात् शुद्ध बुद्धिवाले, मनुष्य की निष्पापता के इस तत्त्व का वर्णन उपनिषदों में भी है (कौषी. 3.1 और पंचदशी. 14.16 और 17 देखो)। गीतारहस्य के बारहवें प्रकरण (पृ. 370 – 374) में इस विषय का पूर्ण विवेचन किया गया है, इसलिए यहाँ पर उससे अधिक विस्तार की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार अर्जुन के प्रश्न करने पर संन्यास और त्याग शब्दों के अर्थ की मीमांसा द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि स्वधर्मानुसार जो कर्म प्राप्त होते जाएँ, उन्हें अहंकार बुद्धि और फलाशा छोड़कर करते रहना ही सात्त्विक अथवा सच्चा त्याग है, कर्मों को छोड़ बैठना सच्चा त्याग नहीं है। अब सत्रहवें अध्याय में कर्म के सात्त्विक आदि भेदों का जो विचार आरम्भ किया गया था, उसी को यहाँ कर्मयोग की दृष्टि से पूरा करते है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.१७