मूल श्लोक
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
aniṣṭamiṣṭaṃ miśraṃ ca trividhaṃ karmaṇaḥ phalam bhavatyatyāgināṃ pretya na tu saṃnyāsināṃ kvacit
अनुवाद
मृत्यु के अनन्तर अत्यागी मनुष्य को अर्थात् फलाशा का त्याग न करनेवाले को तीन प्रकार के फल मिलते है; अनिष्ट. इष्ट और (कुछ इष्ट और कुछ अनिष्ट मिला हुआ) मिश्र। परन्तु संन्यासी को अर्थात् फलाशा छोड़कर कर्म करनेवाले को (ये फल) नहीं मिलते अर्थात् बाधा नहीं कर सकते।
टिप्पणी
त्याग, त्यागी और संन्यासी-सम्बन्धी उक्त विचार पहले (गी॰ 3.4 – 7; 5.2 – 10; 6.1) कई स्थानों में आ चुके हैं, उन्हीं का यहाँ उपसंहार किया गया है। समस्त कर्मों का संन्यास गीता को भी इष्ट नहीं है। फलाशा का त्याग करनेवाला पुरुष ही गीता के अनुसार सच्चा अर्थात् नित्य-संन्यासी है (गी॰ 5.3)। ममतायुक्त फलाशा का अर्थात् अहंकारबुद्धि का त्याग ही सच्चा त्याग है। इसी सिद्धान्त को दृढ़ करने के लिए अब और कारण दिखलाते हैं–
— Lokmanya Tilak