मूल श्लोक
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yatanto yoginaścainaṃ paśyantyātmanyavasthitam yatanto'pyakṛtātmāno nainaṃ paśyantyacetasaḥ
अनुवाद
इसी प्रकार प्रयत्न करनेवाले योगी अपने आप में स्थित आत्मा को पहचानते हैं। परन्तु ये अज्ञ लोग, कि जिनका आत्मा अर्थात् बुद्धि संस्कृत नहीं है, प्रयत्न करके भी उसे नहीं पहचान पाते।
टिप्पणी
10 वें और 11 वें श्लोक में ज्ञान-चक्षु या कर्मयोग-मार्ग से आत्मज्ञान की प्राप्ति का वर्णन कर जीव की उत्क्रान्ति का वर्णन पूरा किया है। पिछले सातवें अध्याय में जैसा वर्णन किया गया है (देखो गी॰ 7.8 – 12), वैसा ही अब आत्मा की सर्व्यापकता का थोड़ा सा वर्णन प्रस्तावना के ढँग पर करके सोलहवें श्लोक से पुरुषोत्तम-स्वरूप का वर्णन किया है।
— Lokmanya Tilak