भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १४.२७ ·

English

मूल श्लोक

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च ।शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

brahmaṇo hi pratiṣṭhā'hamamṛtasyāvyayasya ca śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca

१४.२७अध्याय १४ · गुणत्रयविभागयोग२७ में से श्लोक २७

अनुवाद

क्योंकि अमृत और अव्यय ब्रह्म का, शाश्वत धर्म का एवं एकान्तिक अर्थात् परमावधि के अत्यन्त सुख का अन्तिम स्थान मैं ही हूँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक का भावार्थ यह है, कि सांख्यों के द्वैत को छोड़ देने पर सर्वत्र एक ही परमेश्वर रह जाता है, इस कारण उसी की भक्ति से त्रिगुणात्मक अवस्था भी प्राप्त होती है। और, एक ही ईश्वर मान लेने से साधनों के सम्बन्ध में गीता का कोई भी आग्रह नहीं है (देखो गी॰ 13.24 और 25)। गीता में भक्तिमार्ग को सुलभ अतएव सब लोगों के लिए ग्राह्य कहा सही है; पर यह कहीं भी नहीं कहा है, कि अन्यान्य मार्ग त्याज्य है। गीता में केवल भक्ति , केवल ज्ञान अथवा योग ही प्रतिपाद्य है – ये मत भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के अभिमानियों ने पीछे से गीता पर लाद दिए है। गीता का सच्चा प्रतिपाद्य विषय तो निराला ही है। मार्ग कोई भी हो, गीता में मुख्य प्रश्न यही है कि परमेश्वर का ज्ञान हो चुकने पर संसार के कर्म लोकसंग्रहार्थ किए जावें या छोड़ दिए जावें; और इसका साफ-साफ उत्तर पहले ही दिया जा चुका है कि कर्मयोग श्रेष्ठ है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १४, श्लोक १४.२७