भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १४.२ ·

English

मूल श्लोक

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca

१४.२अध्याय १४ · गुणत्रयविभागयोग२७ में से श्लोक २

अनुवाद

इस ज्ञान का आश्रय करके मुझसे एकरूपता पाए हुए लोग, सृष्टि के उत्पत्ति काल में भी नहीं जन्मते और प्रलयकाल में भी व्यथा नहीं पाते (अर्थात् जन्ममरण से एकदम छुटकारा पा जाते है)।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यह हुई प्रस्तावना। अब पहले बतलाते है, कि प्रकृति मेरा ही स्वरूप है, फिर सांख्यों के द्वैत को अलग कर, वेदान्तशास्त्र के अनुकूल यह निरूपण करते है, कि प्रकृति के सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों से सृष्टि के नाना प्रकार के व्यक्त पदार्थ किस प्रकार निर्मित होते हैं –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १४, श्लोक १४.२