मूल श्लोक
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca
अनुवाद
इस ज्ञान का आश्रय करके मुझसे एकरूपता पाए हुए लोग, सृष्टि के उत्पत्ति काल में भी नहीं जन्मते और प्रलयकाल में भी व्यथा नहीं पाते (अर्थात् जन्ममरण से एकदम छुटकारा पा जाते है)।
टिप्पणी
यह हुई प्रस्तावना। अब पहले बतलाते है, कि प्रकृति मेरा ही स्वरूप है, फिर सांख्यों के द्वैत को अलग कर, वेदान्तशास्त्र के अनुकूल यह निरूपण करते है, कि प्रकृति के सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों से सृष्टि के नाना प्रकार के व्यक्त पदार्थ किस प्रकार निर्मित होते हैं –
— Lokmanya Tilak