मूल श्लोक
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṃ nirmalaṃ phalam rajasastu phalaṃ duḥkhamajñānaṃ tamasaḥ phalam
अनुवाद
कहा है, कि पुण्य-कर्म का फल निर्मल और सात्त्विक होता है, परन्तु राजस कर्म का फल दुःख, और तामस कर्म का फल अज्ञान होता है।