भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १३.७ ·

English

मूल श्लोक

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ saṅghātaścetanā dhṛtiḥ etatkṣetraṃ samāsena savikāramudāhṛtam

१३.७अध्याय १३ · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३५ में से श्लोक ७

अनुवाद

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना अर्थात् प्राण आदि का व्यक्त व्यापार, और धृति यानी धैर्य, इस (13 तत्त्वों के) समुदाय को सविकार क्षेत्र कहते हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यह क्षेत्र और उसके विकारों का लक्षण है। पाँचवें श्लोक में सांख्यमत वालों के पच्चीस तत्त्वों में से, पुरुष को छोड़ शेष चौबीस तत्त्व आ गए हैं। इन्हीं चौबीस तत्त्वों में मन का समावेश होने के कारण इच्छा, द्वेष आदि मनोधर्मों को अलग बतलाने की जरूरत न थी। परन्तु कणाद-मतानुयीयों के मत से ये धर्म आत्मा के है। इस मत को मान लेने से शंका होती है, कि इन गुणों को क्षेत्र में ही समावेश होता है या नहीं। अतः क्षेत्र शब्द की व्याख्या को निःसंदिग्ध करने के लिए यहाँ स्पष्ट रीति से क्षेत्र में ही इच्छा-द्वेष आदि द्वन्द्वों का समावेश कर लिया है और उसी में भय-अभय आदि अन्य द्वन्द्वों का भी लक्षणा से समावेश हो जाता है। यह दिखलाने के लिए, कि सब का संघात अर्थात् समूह क्षेत्र से स्वतन्त्र कर्ता नहीं है, उसकी गणना क्षेत्र में ही की गई है। कई बार 'चेतना' शब्द का 'चैतन्य' अर्थ होता है। परन्तु यहाँ चेतना से 'जड़ देह में प्राण आदि के देख पड़ने वाले व्यापार, अथवा जीवितावस्था की चेष्टा,' इतना ही अर्थ विवक्षित है; और ऊपर दूसरे श्लोक में कहा है, कि जड़ वस्तु में यह चेतना जिससे उत्पन्न होती है, वह चिच्छक्ति अथवा चैतन्य, क्षेत्रज्ञ-रूप से क्षेत्र से अलग रहता है। 'धृति' शब्द की व्याख्या आगे गीता (18.33) में ही की है, उसे देखो। छटे श्लोक के 'समावेश' पद का अर्थ 'इन सब का समुदाय' है। अधिक विवरण गीतारहस्य के आठवें प्रकरण के अन्त (पृ. 143 और 144) में मिलेगा। पहले 'क्षेत्रज्ञ' के मानी 'परमेश्वर' बतला कर फिर खुलासा किया है कि 'क्षेत्र' क्या है। अब मनुष्य के स्वभाव पर ज्ञान के जो परिणाम होते हैं, उनका वर्णन करके यह बतलाते है, कि ज्ञान किसे कहते है; और आगे ज्ञेय का स्वरूप बतलाया है। ये दोनों विषय देखने में भिन्न देख पड़ते हैं अवश्य; पर वास्तविक रीति से वे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार के ही दो भाग हैं। क्योंकि आरम्भ में ही क्षेत्रज्ञ का अर्थ परमेश्वर बतला आए है। अतएव क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ही परमेश्वर का ज्ञान है और उसी का स्वरूप अगले श्लोकों में वर्णित है – बीच में ही कोई मनमाना विषय नहीं धर घुसेड़ा है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १३, श्लोक १३.७