भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १३.३५ ·

English

मूल श्लोक

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

kṣetrakṣetrajñayorevamantaraṃ jñānacakṣuṣā bhūtaprakṛtimokṣaṃ ca ye viduryānti te param

१३.३५अध्याय १३ · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३५ में से श्लोक ३५

अनुवाद

इस प्रकार ज्ञान-चक्षु से अर्थात् ज्ञानरूप नेत्र से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को, एवं सब भूतों की (मूल) प्रकृति को मोक्ष को, जो जानते हैं वे परब्रह्म को पाते हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यह पूरे प्रकरण का उपसंहार है। 'भूतप्रकृतिमोक्ष' शब्द का अर्थ हमने सांख्यशास्त्र के सिद्धान्तानुसार किया है। सांख्यों का सिद्धान्त है, कि मोक्ष का मिलना या न मिलना आत्मा की अवस्थाएँ नहीं हैं, क्योंकि वह तो सदैव अकर्ता और असंग है; परन्तु प्रकृति के गुणों के संग से वह अपने में कर्तृत्व का आरोप किया करता है, इसलिए जब उसका यह अज्ञान नष्ट हो जाता है तब उसके साथ लगी हुई प्रकृति छूट जाती है, अर्थात् उसी का मोक्ष हो जाता है। अतएव सांख्यमत-वाले प्रतिपादन किया करते है, कि तात्त्विक दृष्टि से बन्ध और मोक्ष दोनों अवस्थाएँ प्रकृति की ही हैं (देखो सांख्यकारिका 62 और गीतारहस्य पृ. 164 – 165)। हमें जान पड़ता है, कि सांख्य के ऊपर लिखे हुए सिद्धान्त के अनुसार ही इस लोक में 'प्रकृति का मोक्ष' ये शब्द आए हैं। परन्तु कुछ लोग इन शब्दों का यह अर्थ भी लगाते हैं कि 'भूतेभ्यः प्रकृतेश्च मोक्षः' – पंचमहाभूत और प्रकृति से अर्थात् मायात्मक कर्मों से आत्मा का मोक्ष होता है। यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विवेक ज्ञान-चक्षु से विदित होनेवाला है (गी॰ 13.34); नवें अध्याय की राजविद्या प्रत्यक्ष अर्थात् चर्मचक्षु से ज्ञात होनेवाली है (गी॰ 9.2); और विश्वरूप-दर्शन परम भगवद्भक्त को भी केवल दिव्य-चक्षु से ही होनेवाला है (गी॰ 11.8)। नवें, ग्यारहवें और तेरहवें अध्याय के ज्ञान-विज्ञान निरूपण का उक्त भेद ध्यान देने योग्य है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १३, श्लोक १३.३५