भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १३.२९ ·

English

मूल श्लोक

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

samaṃ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram na hinastyātmanā''tmānaṃ tato yāti parāṃ gatim

१३.२९अध्याय १३ · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३५ में से श्लोक २९

अनुवाद

ईश्वर को सर्वत्र एक-सा व्याप्त समझ कर (जो पुरुष) अपने आप ही घात नहीं करता, अर्थात् अपने आप ही अच्छे मार्ग में लग जाता है, वह इस कारण से उत्तम गति पाता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

27 वें श्लोक में परमेश्वर का जो लक्षण बतलाया है, वह पीछे गी॰8.20 वें श्लोक में आ चुका है और उसका खुलासा गीतारहस्य के नवें प्रकरण में किया गया है (देखो गीतार॰ पृ.218 और 255)। ऐसे ही 28 वें श्लोक में फिर वही बात कही है जो पीछे (गी॰ 6.5 – 7)। कही जा चुकी है, कि आत्मा अपना बन्धु है और वही अपना शत्रु है। इस प्रकार 26, 27 और 28 वें श्लोकों में, सब प्राणियों के विषय में साम्यबुद्धिरूप भाव का वर्णन कर चुकने पर बतलाते हैं, कि इसके जान लेने से क्या होता है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १३, श्लोक १३.२९