मूल श्लोक
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sarvendriyaguṇābhāsaṃ sarvendriyavivarjitam asaktaṃ sarvabhṛccaiva nirguṇaṃ guṇabhoktṛ ca
अनुवाद
(उसमें) सब इन्द्रियों के गुणों का आभास है, पर उसके कोई भी इन्द्रिय नहीं है; वह (सब से) अशक्त अर्थात् अलग होकर भी सब का पालन करता है; और निर्गुण होने पर भी गुणों का उपयोग करता है।