भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १३.१ ·

English

मूल श्लोक

अर्जुन उवाच ।प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

arjuna uvāca prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva kṣetraṃ kṣetrajñameva ca etadveditumicchāmi jñānaṃ jñeyaṃ ca keśava

१३.१अध्याय १३ · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३५ में से श्लोक १

अनुवाद

अर्जुन ने कहा: मुझे प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय के जानने की इच्छा है, सो बतलाओ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

पिछले अध्याय में यह बात सिद्ध की गई है, कि अनिर्देश्य और अव्यक्त परमेश्वर का (बुद्धि से) चिन्तन करने पर अन्त में मोक्ष तो मिलता है; परन्तु उसकी अपेक्षा, श्रद्धा से परमेश्वर के प्रत्यक्ष और व्यक्त स्वरूप की भक्ति करके परमेश्वरार्पण बुद्धि से सब कर्मों को करते रहने पर, वही मोक्ष सुलभ रीति से मिल जाता है। परन्तु इतने ही से ज्ञान-विज्ञान का निरूपण समाप्त नहीं हो जाता, कि जिसका आरम्भ सातवें अध्याय में किया गया है। परमेश्वर का पूर्ण ज्ञान होने के लिए बाहरी सृष्टि के क्षर-अक्षर-विचार के साथ ही साथ मनुष्य के शरीर और आत्मा का अथवा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का भी विचार करना पड़ता है। ऐसे ही यदि सामान्य रीति से जान लिया, कि सब व्यक्त पदार्थ जड़ प्रकृति से उत्पन्न होते हैं, तो भी यह बतलाए बिना ज्ञान-विज्ञान का निरूपण पूरा नहीं होता, कि प्रकृति के किस गुण से यह विस्तार होता है और उसका क्रम कौन-सा है। अतएव तेरहवें अध्याय में पहले क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विचार, और फिर आगे चार अध्यायों में गुणत्रय का विभाग, बतला कर अठारहवें अध्याय में समग्र विषय का उपसंहार किया गया है। सारांश, तीसरी षडध्यायी स्वतन्त्र नहीं है; कर्मयोग सिद्धि के लिए जिस ज्ञान-विज्ञान के निरूपण का सातवें अध्याय में आरम्भ हो चुका है उसी की पूर्ति इस षडध्यायी में की गई है। देखो गीता रहस्य पृ. 456 – 461। गीता की कई एक प्रतियों में, इस तेरहवें अध्याय में, यह श्लोक पाया जाता है – अर्जुन उवाच – प्रकृति पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥ और उसका अर्थ यह है कि – 'अर्जुन ने कहा, मुझे प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय के जानने की इच्छा है, सो बतलाओ।' परन्तु स्पष्ट देख पड़ता है कि किसी ने यह न जान कर क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविचार गीता में आया कैसे है, पीछे से यह श्लोक गीता में घुसेड़ दिया है। टीकाकार इस श्लोक को क्षेपक मानते है, और क्षेपक न मानने से गीता के श्लोकों की संख्या भी सात सौ से एक अधिक बढ़ जाती है। अतः इस श्लोक को हमें भी प्रक्षिप्त ही मान कर, शांकरभाष्य के अनुसार इस अध्याय का आरम्भ किया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १३, श्लोक १३.१