भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १२.३ ·

English

मूल श्लोक

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

ye tvakṣaramanirdeśyamavyaktaṃ paryupāsate sarvatragamacintyaṃ ca kūṭasthamacalaṃ dhruvam

१२.३अध्याय १२ · भक्तियोग२० में से श्लोक ३

अनुवाद

(12.3–4) परन्तु जो अनिर्देश्य अर्थात् प्रत्यक्ष न दिखलाए जाने वाले, अव्यक्त, सर्व्यापी, अचिन्त्य और कूटस्थ अर्थात् सब के मूल में रहनेवाले, अचल और नित्य अक्षर अर्थात् ब्रह्म की उपासना सब इन्द्रियों को रोक कर सर्वत्र समबुद्धि रखते हुए करते है, वे सब भूतों के हित में निमग्न (लोग भी) मुझे ही पाते हैं,

— Lokmanya Tilak

अध्याय १२, श्लोक १२.३