भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १२.२० ·

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मूल श्लोक

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

ye tu dharmyāmṛtamidaṃ yathoktaṃ paryupāsate śraddadhānā matparamā bhaktāste'tīva me priyāḥ

१२.२०अध्याय १२ · भक्तियोग२० में से श्लोक २०

अनुवाद

ऊपर बतलाए हुए इस अमृततुल्य धर्म का जो मत्परायण होते हुए श्रद्धा से आचरण करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यह वर्णन हो चुका है (गी॰ 6.47; 7.18) कि भक्ति मान् ज्ञानी पुरुष सब से श्रेष्ठ है; उसी वर्णन के अनुसार भगवान ने इस श्लोक में बतलाया है, कि हमें अत्यन्त प्रिय कौन है, अर्थात् यहाँ परम भगवद्भक्त कर्मयोगी का वर्णन किया है। पर भगवान ही गी॰ 9.29 वें श्लोक में कहते है, कि 'मुझे सब एक से है, कोई विशेष प्रिय अथवा द्वेष्य नहीं है।' देखने में यह विरोध प्रतीत होता है सही; पर यह जान लेने से कोई विरोध नहीं रह जाता, कि एक वर्णन सगुण उपासना का अथवा भक्ति -मार्ग का है, और दूसरा अध्यात्म-दृष्टि अथवा कर्मविपाक-दृष्टि से किया गया है। गीतारहस्य के तेरहवें प्रकरण के अन्त (पृ. 429 – 430) में इस विषय का विवेचन है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १२, श्लोक १२.२०