मूल श्लोक
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ye tu dharmyāmṛtamidaṃ yathoktaṃ paryupāsate śraddadhānā matparamā bhaktāste'tīva me priyāḥ
अनुवाद
ऊपर बतलाए हुए इस अमृततुल्य धर्म का जो मत्परायण होते हुए श्रद्धा से आचरण करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।
टिप्पणी
यह वर्णन हो चुका है (गी॰ 6.47; 7.18) कि भक्ति मान् ज्ञानी पुरुष सब से श्रेष्ठ है; उसी वर्णन के अनुसार भगवान ने इस श्लोक में बतलाया है, कि हमें अत्यन्त प्रिय कौन है, अर्थात् यहाँ परम भगवद्भक्त कर्मयोगी का वर्णन किया है। पर भगवान ही गी॰ 9.29 वें श्लोक में कहते है, कि 'मुझे सब एक से है, कोई विशेष प्रिय अथवा द्वेष्य नहीं है।' देखने में यह विरोध प्रतीत होता है सही; पर यह जान लेने से कोई विरोध नहीं रह जाता, कि एक वर्णन सगुण उपासना का अथवा भक्ति -मार्ग का है, और दूसरा अध्यात्म-दृष्टि अथवा कर्मविपाक-दृष्टि से किया गया है। गीतारहस्य के तेरहवें प्रकरण के अन्त (पृ. 429 – 430) में इस विषय का विवेचन है।
— Lokmanya Tilak