भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १२.१९ ·

English

मूल श्लोक

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित् ।अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

tulyanindāstutirmaunī santuṣṭo yenakenacit aniketaḥ sthiramatirbhaktimānme priyo naraḥ

१२.१९अध्याय १२ · भक्तियोग२० में से श्लोक १९

अनुवाद

जिसे निन्दा और स्तुति दोनों एक सी है, जो मितभाषी है, जो कुछ मिल जावें उसी में सन्तुष्ट है, एवं जिसका चित्त स्थिर है, जो अनिकेत है अर्थात् जिसका (कर्म-फलाशारूप) ठिकाना कहीं भी नहीं रह गया है, वह भक्ति मान् पुरुष मुझे प्यारा है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

'अनिकेत' शब्द उन यतियों के वर्णनों में भी अनेक बार आया करता है, कि जो गृहस्थाश्रम छोड़ कर, संन्यास धारण करके भिक्षा माँगते हुए घुमते रहते हैं (मनु॰ 6.25) और इनका धात्वर्थ 'बिना घरवाला' है। अतः इस अध्याय के 'निर्म,' 'सर्वारम्भ-परित्यागी' और 'अनिकेत' शब्दों से, तथा अन्यत्र गीता में 'त्यक्तसर्वपरिग्रहः' (4.21), अथवा 'विविक्तसेवी' (18.52) इत्यादि जो शब्द है उनके आधार से संन्यास-मार्गवाले टीकाकार कहते है, कि हमारे मार्ग का यह परम ध्येय 'घर-द्वार छोड़ कर बिना किसी इच्छा के जंगलों में आयु के दिन बिताना' ही गीता में प्रतिपाद्य है; और वे इसके लिए स्मृतिग्रन्थों के संन्यास-आश्रम प्रकरण के श्लोकों का प्रमाण दिया करते है। गीता-वाक्यों के ये निरे संन्यास-प्रतिपादक अर्थ संन्यास-सम्प्रदाय की दृष्टि में महत्त्व के हो सकते हैं, किन्तु वे सच्चे नहीं है। क्योंकि गीता के अनुसार 'निरग्नि ' अथवा 'निष्क्रिय' होना सच्चा संन्यास नहीं है। पीछे कई बार गीता का यह स्थिर सिद्धान्त कहा जा चुका है (देखो गी॰ 5.2 और 6.12) कि केवल फलाशा को छोड़ना अर्थ न करके ऐसा करना चाहिए, कि जिसका गीता के कर्मयोग के साथ मेल मिल सके। गी॰ 4.20 वें श्लोक में कर्मफल की आशा न रखने वाले पुरुष को ही 'निराश्रय' विशेषण लगाया गया है, और गी॰ 6.1 में उसी अर्थ 'अनाश्रितः कर्मफलं' शब्द आए हैं। 'आश्रय' और 'निकेत' इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही है। अतएव अनिकेत का गृहत्यागी अर्थ न करके, ऐसा करना चाहिए कि गृह आदि में जिसके मन का स्थान फँसा नहीं है। इसी प्रकार ऊपर 18 वें श्लोक में जो 'सर्वारम्भपरित्यागी' शब्द है, उसका भी अर्थ 'सारे कर्म या उद्योगों को छोड़ने वाला' नहीं करना चाहिए; किन्तु गीता. 4.16 में जो यह कहा है कि 'जिसके समारम्भ फलाशा-विरहित हैं उसके कर्म ज्ञान से दग्ध हो जाते है' वैसा ही अर्थ यानी 'काम्य आरम्भ अर्थात् कर्म छोड़ने वाला' करना चाहिए। यह बात गी॰ 18.2 और 18.48 एवं 49 से सिद्ध होता है। सारांश, जिसका चित्त घर-गृहस्थी में, बाल-बच्चों में, अथवा संसार के अन्यान्य कामों में उलझा रहता है, उसी को आगे दुःख होता है। अतएव गीता का इतना ही कहना है, कि इन सब बातों में चित्त को फँसने न दो। और मन की इसी वैराग्य स्थिति को प्रगट करने के लिए गीता में 'अनिकेत' और 'सर्वारम्भपरित्यागी' आदि शब्द स्थितप्रज्ञ के वर्णन में आया करते है। यही शब्द यतियों के अर्थात् कर्म त्यागने वाले संन्यासियों के वर्णनों में भी स्मृतिग्रन्थों में आए है। पर सिर्फ इसी बुनियाद पर यह नहीं कहा जा सकता, कि कर्मत्यागरूप संन्यास ही गीता में प्रतिपाद्य है। क्योंकि इसके साथ ही गीता का यह दूसरा निश्चित सिद्धान्त है, कि जिसकी बुद्धि में पूर्ण वैराग्य भिद गया हो, उस ज्ञानी पुरुष को भी इसी विरक्त-बुद्धि से फलाशा छोड़ कर शास्त्रतः प्राप्त होनेवाले सब कर्म करते ही रहना चाहिए। इस समूचे पूर्वापर सम्बन्ध को बिना समझे गीता में जहाँ कहीं 'अनिकेत' की जोड़ के वैराग्य-बोधक शब्द मिल जावें उन्हीं पर सारा दारमदार रख कर यह कह देना ठीक नहीं है, कि गीता में कर्म-संन्यास-प्रधान मार्ग ही प्रतिपाद्य है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १२, श्लोक १२.१९