मूल श्लोक
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
anapekṣaḥ śucirdakṣa udāsīno gatavyathaḥ sarvārambhaparityāgī yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ
अनुवाद
मेरा वही भक्त मुझे प्यारा है कि जो निरपेक्ष, पवित्र और दक्ष है अर्थात् किसी भी काम को आलस्य छोड़ कर करता है, जो (फल के विषय में) उदासीन है, जिसे कोई भी विकार डिगा नहीं सकता, और जिसने (काम्यफल के) सब आरम्भ यानी उद्योग छोड़ दिए हैं।