मूल श्लोक
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।दिशो न जाने न लभे च शर्मप्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
daṃṣṭrākarālāni ca te mukhāni dṛṣṭvaiva kālānalasannibhāni diśo na jāne na labhe ca śarma prasīda deveśa jagannivāsa
अनुवाद
डाढ़ों से विकराल और प्रलयकालीन अग्नि के समान तुम्हारे (इन) मुखों को देखते ही मुझे दिशाएँ नहीं सूझती और समाधान भी नहीं होता! हे जगन्निवास, देवाधिदेव! प्रसन्न हो जाओ!